श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 17: कलि को दण्ड तथा पुरस्कार  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
अनाग:स्विह भूतेषु य आगस्कृन्निरङ्कुश: ।
आहर्तास्मि भुजं साक्षादमर्त्यस्यापि साङ्गदम् ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
अनाग:सु इह—निरपराध; भूतेषु—जीवों में; य:—जो व्यक्ति; आग:-कृत्—अपराध करता है; निरङ्कुश:—उच्छृङ्खल, उद्दंड; आहर्ता अस्मि—मैं काट लूँगा; भुजम्—बाँहें; साक्षात्—प्रत्यक्ष; अमर्त्यस्य अपि—चाहे देवता क्यों न हो; स-अङ्गदम्—बाजू बन्द तथा अन्य सजावट से युक्त ।.
 
अनुवाद
 
 जो उद्दंड व्यक्ति निरपराधियों को सता कर अपराध करता है, वह मेरे द्वारा उखाड़ फेंका जायेगा, चाहे वह बाजूबंद तथा अन्य अलंकारों से युक्त स्वर्ग का निवासी ही क्यों न हो।
 
तात्पर्य
 स्वर्ग के निवासी अमर कहलाते हैं, क्योंकि उनकी आयु मनुष्यों की अपेक्षा काफी लम्बी होती है। मनुष्य के लिए, जिसकी आयु अधिक से अधिक सौ वर्ष होती है, लाखों वर्ष की आयु निश्चय ही अमर लगेगी। उदाहरणार्थ, भगवद्गीता से हमें पता चलता है कि ब्रह्मलोक का एक दिन ४३,००,००० × १,००० सौर वर्षों के तुल्य है। इसी प्रकार स्वर्ग के अन्य ग्रहों का एक दिन इस ग्रह के छह मास के तुल्य होता है और वहाँ के निवासियों की आयु वहाँ के एक करोड़ वर्ष की होती है। अत: स्वर्ग-लोकों में, चूँकि मनुष्य की अपेक्षा उन निवासियों की आयु काफी बड़ी होती है, अतएव कल्पना के आधार पर वहाँ के निवासी अमर कहलाते हैं, यद्यपि भौतिक ब्राह्माण्ड के भीतर अमर कोई भी नहीं है।

महाराज परीक्षित स्वर्ग के ऐसे निवासियों को भी ललकारते हैं, यदि वे निरपराधों को कष्ट पहुँचाते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि राज्य के शासनाध्यक्ष को महाराज परीक्षित के समान सशक्त होना चाहिए, जिससे वह सब से बलवान अपराधी को भी दंड दे सके। राज्य के शासनाध्यक्ष का यह सिद्धान्त होना चाहिए कि जो ईश्वर के आदेशों की अवमानना करने वाला अपराधी है, उसे सदैव दण्डित किया जाय।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥