श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 17: कलि को दण्ड तथा पुरस्कार  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
अप्रतर्क्यादनिर्देश्यादिति केष्वपि निश्चय: ।
अत्रानुरूपं राजर्षे विमृश स्वमनीषया ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
अप्रतर्क्यात्—तर्कशक्ति से परे; अनिर्देश्यात्—चिन्तन-शक्ति से परे; इति—इस प्रकार; केषु—कोई; अपि—भी; निश्चय:— निश्चित रूप से; अत्र—यहाँ पर; अनुरूपम्—उनमें से सही, उचित; राज-ऋषे—हे राजर्षि; विमृश—अपने आप निर्णय लो; स्व—अपनी; मनीषया—बुद्धि की शक्ति द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 कुछ ऐसे भी चिन्तक हैं, जिनका विश्वास है कि न तो तर्क द्वारा कष्ट का कारण निश्चित किया जा सकता है, न उसे कल्पना से जाना जा सकता है, न ही शब्दों द्वारा उसे व्यक्त किया जा सकता है। हे राजर्षि, आप अपनी बुद्धि से यह सब सोचकर अपने आप निर्णय करें।
 
तात्पर्य
 वैष्णवमतावलम्बी अर्थात् भगवद्भक्तों का ऐसा विश्वास है, जैसाकि ऊपर कहा गया है, कि परमेश्वर की इच्छा के बिना कुछ भी घटित नहीं हो सकता। वे ही परम निर्देशक हैं, क्योंकि वे भगवद्गीता (१५.१५) में पुष्टि करते हैं कि सर्वव्यापी परमात्मा के रूप में वे सबों के हृदय में वास करते हैं और सारे कर्मों पर निगरानी रखते हैं तथा सारे कर्मों के साक्षी हैं। यहाँ पर नास्तिकों के इस तर्क का खण्डन होता है कि जब तक किसी न्यायाधीश के समक्ष किसी का दुष्कर्म सिद्ध न हो ले, तब तक उसे दण्डित नहीं किया जा सकता, क्योंकि हम निरन्तर साथ रहने वाले साक्षी तथा जीव के नित्य संगी को स्वीकार करते हैं। जीव ने पूर्वजन्म में या इसी जीवन में शरीर रूपी जो कुछ किया हो, उसे वह भूल सकता है, लेकिन हमें यह जान लेना चाहिए कि भौतिक शरीर रूपी एक ही वृक्ष में जीव तथा परमात्मा दो पक्षियों के रूप में, बैठे हुए हैं। इनमें से एक अर्थात् जीव उस वृक्ष के फल खा रहा है और दूसरा अर्थात् परमात्मा उसके कार्यकलापों का साक्षी बना हुआ है। अतएव परमात्मा ही जीव के सारे कार्यकलापों के साक्षी हैं और उनके निर्देशानुसार जीव स्मरण रख सकता है या भूल सकता है कि उसने पूर्वजन्म में क्या किया। अतएव वे सर्वव्यापी निराकार ब्रह्म तथा प्रत्येक के हृदय में स्थित अन्तर्यामी परमात्मा हैं। वह समस्त भूत, वर्तमान तथा भविष्य के ज्ञाता हैं, उनसे कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता। भक्तगण इस सत्य को जानते हैं, अतएव वे फल की आकांक्षा न करके अपना कार्य निष्ठापूर्वक करते हैं। इसके अतिरिक्त, चिन्तन या पाण्डित्य के द्वारा भगवान् की प्रतिक्रियाओं का अनुमान लगाना सम्भव नहीं है। तो फिर वे क्यों कुछ को कष्ट में डालते हैं और कुछ को नहीं? वे वैदिक ज्ञान के परम ज्ञाता हैं, और इस तरह वे वास्तविक वेदान्ती हैं। साथ ही, वे वेदान्त के संकलनकर्ता हैं। कोई भी उनसे स्वतंत्र नहीं है और हर कोई अलग-अलग ढंग से उनकी सेवा में लगा हुआ है। जीव को बद्ध अवस्था में ऐसी सेवाएँ प्रकृति की शक्ति के अधीन होकर करनी पड़ती है, जबकि मुक्त अवस्था में स्वेच्छा से भगवान् की सेवा के लिए आध्यात्मिक प्रकृति जीव की सहायता करती है। उनके कर्मों में किसी प्रकार असंगति या उन्माद नहीं होता। वे सब परम सत्य के पथ पर होते हैं। भीष्मेदव ने भगवान् के अचिन्त्य कर्मों का ठीक अनुमान लगाया था। अतएव निष्कर्ष यह निकलता है कि महाराज परीक्षित के समक्ष, धर्म के प्रतिनिधि तथा पृथ्वी के प्रतिनिधि के सारे कष्टों को जानबूझ कर यह सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत किया गया था, क्योंकि वे भलीभाँति जानते थे कि आध्यात्मिक उन्नति के दो स्तम्भों—गाय (पृथ्वी) तथा ब्राह्मण (धर्म)—को किस तरह संरक्षण प्रदान करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति पूरी तरह भगवान् के वश में है। वे जब किसी के द्वारा कोई काम कराना चाहते हैं, तो उनका कर्म सही होता है। इस प्रकार महाराज परीक्षित की महानता की परीक्षा ली गई। अब हमें देखना है कि वे अपने कुशाग्र मन से इसे कैसे हल करते हैं।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥