श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 17: कलि को दण्ड तथा पुरस्कार  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक
इयं च भूमिर्भगवता न्यासितोरुभरा सती ।
श्रीमद्भ‍िस्तत्पदन्यासै: सर्वत: कृतकौतुका ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
इयम्—यह; च—तथा; भूमि:—पृथ्वी की सतह; भगवता—भगवान् द्वारा; न्यासित—स्वयं तथा अन्यों के द्वारा सम्पन्न; उरु— भारी; भरा—बोझ; सती—ऐसा करने पर; श्रीमद्भि:—सर्व कल्याणकारी द्वारा; तत्—वह; पद-न्यासै:—पदचिह्न द्वारा; सर्वत:—चारों ओर; कृत—किया गया; कौतुका—सौभाग्य ।.
 
अनुवाद
 
 निश्चय ही, पृथ्वी का बोझ भगवान् द्वारा तथा अन्यों द्वारा भी कम किया गया था। जब वे अवतार के रूप में विद्यमान थे, तो उनके शुभ पदचिह्नों द्वारा समस्त कल्याण सम्पन्न होता था।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥