श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 17: कलि को दण्ड तथा पुरस्कार  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
इति धर्मं महीं चैव सान्‍त्वयित्वा महारथ: ।
निशातमाददे खड्गं कलयेऽधर्महेतवे ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; धर्मम्—धर्म को; महीम्—पृथ्वी को; च—भी; एव—जिस तरह; सान्त्वयित्वा—सान्त्वना देकर; महा रथ:—हजारों से अकेले लडऩे-वाला सेनापति, महारथी; निशातम्—तेज; आददे—ले लिया; खड्गम्—तलवार; कलये— कलि को मारने के लिए; अधर्म—अधर्म के; हेतवे—मूल कारण ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार, एक साथ हजार शत्रुओं से अकेले लड़ सकनेवाले महाराज परीक्षित ने धर्म तथा पृथ्वी को सान्त्वना दी। तब उन्होंने समस्त अधर्म के कारण साक्षात् कलि को मारने के लिए अपनी तेज तलवार निकाल ली।
 
तात्पर्य
 जैसाकि ऊपर कहा जा चुका है, साक्षात् कलि वह है, जो जानबूझ कर शास्त्रों द्वारा वर्जित समस्त प्रकार के पापकर्मों को करता है। यह कलियुग निश्चित रूप से कलि के समस्त कार्यकलापों से भरा हुआ रहेगा, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि समाज के सारे नेता, प्रशासक, विद्वान तथा बुद्धिमान व्यक्ति, या सबसे ऊपर भगवद्भक्त हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें और कलियुग के सारे कार्यों के प्रति निश्चेष्ट हो जाँय। वर्षाऋतु में निश्चित रूप से प्रचुर वर्षा होती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि लोग वर्षा से बचने के लिए साधन न अपनायें। राज्य के कार्यकारी अध्यक्षों का तथा अन्यों का कर्तव्य है कि वे कलि के कार्यकलापों के विरुद्ध या कलि द्वारा प्रभावित पुरुषों के विरुद्ध आवश्यक कार्यवाही करें। महाराज परीक्षित राज्य के आदर्श कार्यकारी अध्यक्ष हैं, क्योंकि वे अपनी तेज तलवार से कलि को मारने के लिए तुरन्त तैयार हो गये। प्रशासकों को चाहिए कि वे केवल भ्रष्टाचार-विरोधी प्रस्ताव पारित न करें, अपितु उन्हें चाहिए कि भ्रष्टाचार फैलानेवाले पुरुषों को प्रमाणित शास्त्रों की दृष्टि से पैनी तलवार लेकर मारने के लिए उद्यत रहें। शराब की दुकानों को अनुमति देकर प्रशासक लोग भ्रष्टाचारी गतिविधियों को नहीं रोक सकते। उन्हें चाहिए कि मादक औषधियों तथा शराब की सारी दुकानें अविलम्ब बन्द करा दें और जिन लोगों को नशे की लत हो, उन्हें मृत्यु-दण्ड तक देने से न हिचकें। कलि के कार्यकलापों को बन्द करने का यही उपाय है, जैसाकि यहाँ पर महारथी महाराज परीक्षित ने प्रदर्शित किया है।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥