श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 17: कलि को दण्ड तथा पुरस्कार  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
तं जिघांसुमभिप्रेत्य विहाय नृपलाञ्छनम् ।
तत्पादमूलं शिरसा समगाद् भयविह्वल: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उसको; जिघांसुम्—मारने के लिए इच्छुक; अभिप्रेत्य—ठीक से जानते हुए; विहाय—छोडक़र; नृप-लाञ्छनम्—राजा के वेश को; तत्-पाद-मूलम्—उसके चरणों पर; शिरसा—सिर के बल; समगात्—पूर्ण रूप से शरणागत; भय-विह्वल:— भयभीत ।.
 
अनुवाद
 
 जब कलि ने समझ लिया कि राजा उसको मार डालना चाह रहा है, तो उसने तुरन्त राजा का वेश त्याग दिया और भयभीत होकर अपना सिर झुका कर पूर्णरूप से उनके समक्ष आत्म- समर्पण कर दिया।
 
तात्पर्य
 कलि का राजवेश नकली था। राजा या क्षत्रिय के लिए राजवेश उपयुक्त होता है, किन्तु जब निम्नजाति का मनुष्य राजा का बनावटी वेश धारण कर लेता है, तो महाराज परीक्षित जैसे प्रामाणिक क्षत्रिय की ललकार से उसकी असली पहचान प्रकट हो जाती है। असली क्षत्रिय कभी आत्म-समर्पण नहीं करता। वह अपने प्रतिद्वंद्वी क्षत्रिय की ललकार को स्वीकार करता है और या तो मरते दम तक लड़ता है या जीतता है। सच्चा क्षत्रिय आत्म-समर्पण करना तो जानता ही नहीं। कलियुग में न जाने कितने ऐसे छद्मवेश धारण करनेवाले हैं, जो प्रशासकों का स्वाँग करते हैं, किन्तु उनका भेद तब खुल जाता है, जब असली क्षत्रिय उन्हें ललकारता है। अतएव जब छद्मवेशधारी कलि ने देखा कि महाराज परीक्षित से युद्ध करना उसके बूते के बाहर है, तो उसने अधीनस्थ के समान अपना सिर झुका दिया और अपना राजवेश उतार दिया।
 
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