श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 17: कलि को दण्ड तथा पुरस्कार  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक
पतितं पादयोर्वीर: कृपया
दीनवत्सल: ।
शरण्यो
नावधीच्छ्‍लोक्य आह चेदं हसन्निव ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
पतितम्—गिरा हुआ; पादयो:—पैरों पर; वीर:—वीर; कृपया—कृपावश; दीन-वत्सल:—दान के प्रति दयालु; शरण्य:—जो शरण स्वीकार करने में योग्य है, शरणागत का रक्षक; न—नहीं; अवधीत्—बध किया; श्लोक्य:—जो गायन किये जाने योग्य है; आह—कहा; च—भी; इदम्—यह; हसन्—मुसकाते हुए; इव—सदृश ।.
 
अनुवाद
 
 शरणागत के रक्षक तथा इतिहास में प्रशंसनीय महाराज परीक्षित ने उस दीन शरणागत तथा पतित कलि को मारा नहीं, अपितु वे दयापूर्वक हँसने लगे, क्योंकि वे दीनवत्सल जो हैं।
 
तात्पर्य
 जब एक सामान्य क्षत्रिय भी शरणागत व्यक्ति को नहीं मारता, तो महाराज परीक्षित के लिए क्या कहा जाय, जो स्वभाव से दयालु तथा गरीबों पर सदय हैं। वे हँस रहे थे, क्योंकि छद्मवेशधारी कलि ने निम्नजाति के व्यक्ति के रूप में अपनी पहचान प्रकट कर दी थी और वे सोच रहे थे कि यह कितनी विडम्बना है कि जिस पैनी तलवार से वे जिस किसी का वध कर देते थे, उससे यह दीन निम्न जातिवाला कलि सामयिक आत्मसमर्पण के कारण बचा जा रहा है। इसीलिए इतिहास में महाराज परीक्षित के यश तथा सदयता का गुणगान किया जाता है। वे सदय तथा कृपालु सम्राट थे और अपने शत्रु को भी शरण में लेनेवाले थे। इस तरह दैवी इच्छा से कलि बच गया।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥