श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 17: कलि को दण्ड तथा पुरस्कार  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक
इत्थम्भूतानुभावोऽयमभिमन्युसुतो नृप: ।
यस्य पालयत: क्षौणीं यूयं सत्राय दीक्षिता: ॥ ४५ ॥
 
शब्दार्थ
इत्थम्-भूत—इस प्रकार हुआ; अनुभाव:—अनुभव; अयम्—इसका; अभिमन्यु-सुत:—अभिमन्यु का पुत्र; नृप:—राजा; यस्य—जिसका; पालयत:—अपने शासन के कारण; क्षौणीम्—पृथ्वी पर; यूयम्—तुम सब; सत्राय—यज्ञ सम्पन्न करने के लिए; दीक्षिता:—दीक्षित हुए ।.
 
अनुवाद
 
 अभिमन्यु पुत्र, महाराज परीक्षित, इतने अनुभवी हैं कि उनके पटु शासन तथा संरक्षकत्व के बल पर तुम सब इस प्रकार का यज्ञ सम्पन्न कर रहे हो।
 
तात्पर्य
 ब्राह्मण तथा संन्यासी समाज के आध्यात्मिक उन्नयन में अत्यन्त दक्ष होते हैं, जबकि क्षत्रिय या प्रशासक मानव समाज में भौतिक शान्ति तथा सम्पन्नता लाने में दक्ष होते हैं। दोनों ही सुख के स्तम्भ समान हैं, अतएव वे जन-कल्याण में पूर्ण सहयोग के निमित्त होते हैं। महाराज परीक्षित कलि को अपने कार्यक्षेत्र से भगाने में अत्यन्त अनुभवी थे, जिससे राज्य में आध्यात्मिक प्रबुद्धता के लिए स्थान मिल सका। यदि सामान्य लोग ग्रहणशील न हों, तो आध्यात्मिक प्रबुद्धता की आवश्यकता पर बल दे पाना कठिन होता है। तप, स्वच्छता, दया तथा सत्य—ये धर्म के मूल सिद्धान्त हैं। इनसे आध्यात्मिक ज्ञान को ग्रहण करने की भूमिका तैयार होती है और महाराज परीक्षित ने इसके लिए अनुकूल परिस्थिति बना ली थी। इस तरह नैमिषारण्य के ऋषि एक हजार वर्षों का यज्ञ करने में सक्षम बने। दूसरे शब्दों में, राज्य की सहायता के बिना, दर्शन का कोई मत या धर्म निरन्तर प्रगति नहीं कर सकता। सभी के लिए कल्याणकारी इस अच्छे कार्य के लिए ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों के बीच पूरा सहयोग होना चाहिए। महाराज अशोक के समय तक भी यह भावना बनी रही। राजा अशोक ने भगवान् बुद्ध को पर्याप्त समर्थन प्रदान किया, जिससे उनका सम्प्रदाय सारे विश्व में फैल गया।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध के अन्तर्गत ‘कलि को दण्ड तथा पुरस्कार’ नामक सत्रहवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
 
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