श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 18: ब्राह्मण बालक द्वारा महाराज परीक्षित को शाप  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
ऋषय ऊचु:
सूत जीव समा: सौम्य शाश्वतीर्विशदं यश: ।
यस्त्वं शंससि कृष्णस्य मर्त्यानाममृतं हि न: ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
ऋषय: ऊचु:—ऋषियों ने कहा; सूत—हे सूत गोस्वामी; जीव—जीवित रहो; समा:—अनेक वर्षों तक; सौम्य—गम्भीर; शाश्वती:—शाश्वत; विशदम्—विशेष रूप से; यश:—यश में; य: त्वम्—क्योंकि आप; शंससि—सुन्दर ढंग से कहते हो; कृष्णस्य—भगवान् कृष्ण की; मर्त्यानाम्—मर्त्य प्राणियों की; अमृतम्—जीवन की शाश्वतता, अक्षरता; हि—निश्चय ही; न:— हमारा ।.
 
अनुवाद
 
 श्रेष्ठ मुनियों ने कहा : हे सौम्य सूत गोस्वामी! आप अनेक वर्षों तक जिएँ तथा शाश्वत यश प्राप्त करें, क्योंकि आप भगवान् श्रीकृष्ण के कार्यकलापों के विषय में उत्तम ढंग से बता रहे हैं। हम जैसे मर्त्य प्राणियों के लिए यह अमृत के समान है।
 
तात्पर्य
 जब हम परमेश्वर के दिव्य गुणों तथा कार्यकलापों के विषय में सुनते हैं, तो हमें सदा भगवद्गीता (४.९) में भगवान् ने खुद ने अपने सम्बन्ध में जो कुछ कहा है, उसका स्मरण करना चाहिए। उनके सारे कार्य, यहाँ तक कि जब वे मानव-समाज में कार्य करते हैं, तब भी दिव्य ही होते हैं, क्योंकि वे सब भगवान् की आध्यात्मिक शक्ति द्वारा अभिप्रेरित होते हैं, जो उनकी भौतिक शक्ति से भिन्न है। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है, ऐसे कार्य दिव्यम् कहलाते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि वे सामान्य जीवों की भाँति, भौतिक शक्ति के वश में रहकर कार्य नहीं करते हैं, और जन्म नहीं लेते हैं। न ही उनका शरीर सामान्य जीवों के शरीर की भाँति भौतिक होता है, न ही परिवर्तनशील होता है। चाहे भगवान् से या किसी प्रामाणिक स्रोत से जो व्यक्ति इस तथ्य को समझ लेता है, वह इस वर्तमान शरीर को त्यागने के बाद पुन: जन्म नहीं लेता। ऐसे प्रबुद्ध जीव को भगवद्धाम में प्रविष्ट होने दिया जाता है, जहाँ वह भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में लग जाता है। अतएव जिस रूप में भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत में भगवान् के दिव्य कार्यकलाप उद्धृत हैं, उनके विषय में हम जितना ही श्रवण करते हैं, उतना ही हम उनकी दिव्य प्रकृति के विषय में जान पाते हैं और उतना ही भगवद्धाम के पथ पर अग्रसर होते रहते हैं।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥