श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 18: ब्राह्मण बालक द्वारा महाराज परीक्षित को शाप  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
तन्नो भवान् वै भगवत्प्रधानो
महत्तमैकान्तपरायणस्य ।
हरेरुदारं चरितं विशुद्धं
शुश्रूषतां नो वितनोतु विद्वन् ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—अतएव; न:—हम सबका; भवान्—आप; वै—निश्चय ही; भगवत्—भगवान् से सम्बन्धित; प्रधान:—मुख्यत:; महत्- तम—सबसे बड़े; एकान्त—एकमात्र; परायणस्य—आश्रय का; हरे:—भगवान् का; उदारम्—निष्पक्ष; चरितम्—कार्यकलाप; विशुद्धम्—दिव्य; शुश्रूषताम्—सुनने के इच्छुक हैं; न:—हम; वितनोतु—कृपा करके वर्णन करें; विद्वन्—हे विद्वान ।.
 
अनुवाद
 
 हे सूत गोस्वामी, आप विद्वान हैं तथा भगवान् के शुद्ध भक्त हैं, क्योंकि आपकी सेवा का प्रमुख उद्देश्य भगवान् हैं। अतएव आप कृपया हमें भगवान् की लीलाएँ कह सुनायें, जो समस्त भौतिक विचारधारा से ऊपर हैं, क्योंकि हम ऐसा संदेश प्राप्त करने के लिए आतुर हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् के दिव्य कार्यकलापों के वक्ता का एक ही लक्ष्य होना चाहिए और वह है पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण की पूजा तथा सेवा। और ऐसी कथाओं के श्रोताओं को इन्हें सुनने के लिए आतुर होना चाहिए। जब ऐसा संयोग संभव हो जाता है अर्थात् जब योग्य वक्ता तथा योग्य श्रोता का संयोग हो जाता है, तभी दिव्य के विषय में अत्यन्त सौहार्दपूर्ण वार्ता हो पाती है। व्यावसायिक वक्ता तथा भौतिकता में लिप्त श्रोता ऐसी वार्ताओं से कभी वास्तविक लाभ नहीं उठा पाते। व्यावसायिक वक्ता (वाचक) अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए भागवत सप्ताह का दिखावा करते हैं और भौतिकताग्रस्त श्रोता भागवत सप्ताह की इन वार्ताओं को किसी न किसी भौतिक लाभ यथा धार्मिकता, सम्पत्ति, इन्द्रिय-तुष्टि या मोक्ष के लिए सुनते हैं—भागवत की ऐसी वार्ताएँ भौतिक गुणों के कल्मष से शुद्ध नहीं रहतीं। लेकिन नैमिषारण्य के मुनियों तथा श्रील सूत गोस्वामी के मध्य चल रही वार्ताएँ दिव्य स्तर पर थीं। इनमें भौतिक लाभ का कोई उद्देश्य नहीं था। ऐसी वार्ताओं में श्रोता तथा वक्ता दोनों को असीम दिव्य आनन्द की प्राप्ति होती है। अतएव वे ऐसी वार्ताओं को हजारों वर्षों तक चालू रख सकते हैं। अब तो भागवत सप्ताह केवल सात दिनों तक रखा जाता है और खेल खतम करने के बाद, श्रोता तथा वक्ता दोनों पहले की तरह भौतिक कार्यों में लग जाते हैं। वे ऐसा कर सकते हैं, क्योंकि वक्ता भागवत-प्रधान नहीं है और श्रोता भी शुश्रूषताम् नहीं है, जैसाकि ऊपर कहा गया है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥