श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 18: ब्राह्मण बालक द्वारा महाराज परीक्षित को शाप  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
स वै महाभागवत: परीक्षिद्
येनापवर्गाख्यमदभ्रबुद्धि: ।
ज्ञानेन वैयासकिशब्दितेन
भेजे खगेन्द्रध्वजपादमूलम् ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; वै—निश्चय ही; महा-भागवत:—उच्चकोटि का भक्त; परीक्षित्—राजा; येन—जिससे; अपवर्ग-आख्यम्—मोक्ष नाम से; अदभ्र—स्थिर; बुद्धि:—बुद्धि; ज्ञानेन—ज्ञान से; वैयासकि—व्यास पुत्र; शब्दितेन—द्वारा उच्चारित; भेजे—ले जाया गया; खग-इन्द्र—पक्षियों का राजा, गरुड़; ध्वज—पताका, झंडा; पाद-मूलम्—पैरों के तलवे ।.
 
अनुवाद
 
 हे सूत गोस्वामी, कृपा करके भगवान् की उन्हीं कथाओं का वर्णन करें, जिनसे महाराज परीक्षित, जिनकी बुद्धि मोक्ष पर केन्द्रित थी, उन भगवान् के चरणकमलों को प्राप्त कर सके, जो पक्षिराज गरुड़ के आश्रय हैं। इन्हीं कथाओं का उच्चारण व्यास-पुत्र (श्रील शुकेदव) द्वारा हुआ था।
 
तात्पर्य
 मोक्ष के मार्ग को लेकर जिज्ञासुओं में कुछ मतभेद है। ऐसे दिव्य जिज्ञासु निर्विशेषवादी तथा भगवद्भक्त कहलाते हैं। भगवद्भक्त भगवान् के दिव्य रूप की पूजा करते हैं, जबकि निर्विशेषवादी चमचमाते तेज या भगवान् की शारीरिक किरणों का ध्यान धरते हैं, जिसे ब्रह्मज्योति कहते हैं। यहाँ पर यह कहा गया है कि महाराज परीक्षित को भगवान् के चरणकमलों की प्राप्ति व्यासदेव के पुत्र श्रील शुकदेव गोस्वामी के उपदेशों से हुई। श्रील शुकदेव गोस्वामी भी प्रारम्भ में निर्विशेषवादी थे, जैसाकि भागवत (२.१.९) में उनकी स्वयं की उक्ति है किन्तु बाद में वे भगवान् की दिव्य लीलाओं के प्रति आकृष्ट हुए और भक्त बन गये। ऐसे पूर्ण ज्ञान से युक्त भक्त महाभागवत या प्रथम कोटि के भक्त कहलाते हैं। भक्तों की तीन श्रेणियाँ हैं—प्राकृत, मध्यम तथा महाभागवत। प्राकृत अथवा तृतीय श्रेणी के भक्तों को भगवान् तथा उनके भक्तों का कोई विशेष ज्ञान नहीं होता, वे मन्दिर में पूजा करने वाले होते हैं। मध्यम अर्थात् द्वितीय श्रेणी के भक्त भगवान् को, भगवान् के भक्तों को, नवदीक्षितों तथा अभक्तों को भी भलीभाँति जानते हैं। लेकिन महाभागवत या प्रथम श्रेणी के भक्त हर वस्तु को भगवान् से सम्बन्धित और हर वस्तु में भगवान् की उपस्थिति को देखते हैं। अतएव महाभागवत एक भक्त तथा अभक्त में कोई अन्तर नहीं मानता। महाराज परीक्षित ऐसे ही महाभागवत भक्त थे, क्योंकि उनको एक महाभागवत भक्त शुकेदव गोस्वामी से दीक्षा प्राप्त हुई थी। वे सबों पर समान रूप से दयालु थे, यहाँ तक कि कलि पर भी, तो अन्यों के विषय में क्या कहा जाय।

इस प्रकार संसार के दिव्य इतिहास में ऐसे अनेक निर्विशेषवादी हुए हैं, जो बाद में भक्त बन गये हैं। लेकिन एक भक्त कभी भी निर्विशेषवादी नहीं बना है। यह एक तथ्य सिद्ध करता है कि दिव्य सीढिय़ों में जिस सीढ़ी पर भक्त बैठा है, वह उस सीढ़ी से ऊपर है, जिस पर निर्विशेषवादी स्थित है। भगवद्गीता (१२.५) में भी कहा गया है कि निराकार की सीढ़ी पर चिपका हुआ व्यक्ति लाभ की अपेक्षा कष्ट अधिक भोगता है। अतएव शुकदेव गोस्वामी द्वारा महाराज परीक्षित को प्रदत्त ज्ञान ने उन्हें भगवद्भक्ति प्राप्त करने में सहायता पहुँचाई। सिद्धि की यह अवस्था अपवर्ग या मोक्ष की अवस्था कहलाती है। मोक्ष सम्बन्धी सरल ज्ञान भौतिक ज्ञान है। भौतिक बन्धन से वास्तविक रूप से छूट जाना मुक्ति कहलाती है, लेकिन भगवान् की दिव्य सेवा की उपलब्धि मोक्ष की पूर्ण अवस्था कहलाती है। ऐसी अवस्था ज्ञान तथा वैराग्य से ही प्राप्त हो पाती है, जैसाकि हम पहले बता चुके हैं (भागवत १.२.१२) और श्रील शुकेदव गोस्वामी द्वारा जिस तरह का पूर्ण ज्ञान प्रदान किया जाता है, उससे भगवान् की दिव्य सेवा की प्राप्ति होती है।

 
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