श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 18: ब्राह्मण बालक द्वारा महाराज परीक्षित को शाप  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक
विप्रकीर्णजटाच्छन्नं रौरवेणाजिनेन च ।
विशुष्यत्तालुरुदकं तथाभूतमयाचत ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
विप्रकीर्ण—बिखरे हुए; जट-आच्छन्नम्—लम्बी-लम्बी जटाओं से ढँका; रौरवेण—मृगछाला से; अजिनेन—चर्म से; च—भी; विशुष्यत्—सूखा हुआ; तालु:—तालू; उदकम्—जल; तथा-भूतम्—उस अवस्था में; अयाचत—माँगा ।.
 
अनुवाद
 
 ध्यान-मग्न मुनि मृग-चर्म लपेटे थे और इनकी लम्बी जटाएँ उनके सारे शरीर पर बिखरी हुई थीं। प्यास के मारे सूखे तालू वाले राजा ने उनसे जल माँगा।
 
तात्पर्य
 प्यासे होने के कारण राजा ने मुनि से जल माँगा। ऐसे महान् भक्त राजा ने समाधि में लीन मुनि से जल माँगा यह निश्चय ही दैवकृत था। अन्यथा ऐसी विलक्षण घटना की कोई सम्भावना न थी। इस तरह महाराज परीक्षित विषम परीस्थिति में रखे गये, जिससे आगे चलकर श्रीमद्भागवत का प्राकट्य हो सका।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥