श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 18: ब्राह्मण बालक द्वारा महाराज परीक्षित को शाप  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक
इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षो वयस्यानृषिबालक: ।
कौशिक्याप उपस्पृश्य वाग्वज्रं विससर्ज ह ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; उक्त्वा—कहकर; रोष-ताम्र-अक्ष:—क्रुद्ध होने के कारण लाल-लाल आँखें किये; वयस्यान्—संगियों को; ऋषि-बालक:—ऋषि का पुत्र; कौशिकी—कौशिक नदी का; आप:—जल; उपस्पृश्य—स्पर्श करके; वाक्—शब्द; वज्रम्— वज्र; विससर्ज—फेंका; ह—भूतकाल का सूचक शब्द ।.
 
अनुवाद
 
 क्रोध से लाल-लाल आँखें किये, अपने संगियों से कहकर, उस ऋषिपुत्र ने कौशिक नदी के जल का स्पर्श किया और निम्नलिखित शब्दरूपी वज्र छोड़ा।
 
तात्पर्य
 जैसाकि इन श्लोक से प्रकट होता है कि जिन परिस्थितियों में महाराज परीक्षित को शाप दिया गया, वे अत्यन्त बचकानी थीं। शृंगी अपने अबोध संगियों के बीच अपना अविवेक दिखा रहा था। कोई भी समझदार व्यक्ति उसे सारे मानव समाज के प्रति इतनी भारी क्षति करने से रोक लेता। किन्तु उस अनुभव-हीन ब्राह्मण-पुत्र ने अपनी अर्जित ब्रह्मशक्ति का दिखावा करने के उद्देश्य से, महाराज परीक्षित जैसे राजा का वध करके बहुत बड़ी भूल की।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥