श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 18: ब्राह्मण बालक द्वारा महाराज परीक्षित को शाप  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक
विसृज्य तं च पप्रच्छ वत्स कस्माद्धि रोदिषि ।
केन वा तेऽपकृतमित्युक्त: स न्यवेदयत् ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
विसृज्य—एक ओर फेंककर; तम्—उसको; च—भी; पप्रच्छ—पूछा; वत्स—प्रिय पुत्र; कस्मात्—किसलिए; हि—निश्चय ही; रोदिषि—रो रहे हो; केन—किसके द्वारा; वा—अथवा; ते—वे; अपकृतम्—दुर्व्यवहार किया; इति—इस प्रकार; उक्त:—कहा गया; स:—उस लडक़े ने; न्यवेदयत्—सब कुछ बता दिया ।.
 
अनुवाद
 
 उन्होंने मरा हुआ सर्प एक ओर फेंक दिया और अपने पुत्र से पूछा कि वह क्यों रो रहा है? क्या किसी ने उसे चोट पहुँचाई है? यह सुनकर बालक ने जो कुछ घटना घटी थी, उसे कह सुनाया।
 
तात्पर्य
 पिता ने गले में पड़े हुए सर्प को अधिक गम्भीरता से नहीं लिया। उन्होंने उसे फेंक दिया। वास्तव में महाराज परीक्षित से कोई बहुत बड़ी भूल नहीं हुई थी, लेकिन मूर्ख पुत्र ने उसे गम्भीरता से लिया और कलि के वश में होने से उसने राजा को शाप दे दिया। इस तरह उसने एक सुखद इतिहास के अध्याय का अन्त कर दिया।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥