श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 18: ब्राह्मण बालक द्वारा महाराज परीक्षित को शाप  »  श्लोक 43

 
श्लोक
अलक्ष्यमाणे नरदेवनाम्नि
रथाङ्गपाणावयमङ्ग लोक: ।
तदा हि चौरप्रचुरो विनङ्‍क्ष्य-
त्यरक्ष्यमाणोऽविवरूथवत् क्षणात् ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
अलक्ष्यमाणे—समाप्त किये जाने से; नर-देव—राजा का सा; नाम्नि—नामधारी; रथ-अङ्ग-पाणौ—भगवान् का प्रतिनिधि; अयम्—यह; अङ्ग—हे बालक; लोक:—यह संसार; तदा हि—तुरन्त; चौर—चोर; प्रचुर:—अत्यधिक; विनङ्क्ष्यति—परास्त किया; अरक्ष्यमाण:—सुरक्षित न रहकर; अविवरूथ-वत्—मेमने की भाँति; क्षणात्—तुरन्त ।.
 
अनुवाद
 
 हे बालक, एकछत्र राजसत्ता द्वारा रथचक्र धारण करनेवाले भगवान् का प्रतिनिधित्व किया जाता है और जब राजसत्ता ही मिट जाती है, तो सारा संसार चोरों से भर जाता है, जो तितर बितर मेमनों की भाँति असुरक्षित प्रजा को तुरन्त परास्त कर देते हैं।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत के अनुसार एकछत्र राजा परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है। राजा को भगवान् का प्रतिनिधि कहा जाता है, क्योंकि उसे जीवों की रक्षा करने के लिए दैवी-गुण अर्जित करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। कुरुक्षेत्र का युद्ध भगवान् ने अपने असली प्रतिनिधि महाराज युधिष्ठिर को प्रतिष्ठित कराने के लिए सुनियोजित किया था। यदि आदर्श राजा को, संस्कृति तथा भक्ति से, युद्ध- कौशल में प्रशिक्षित किया जाय, तो वह पूर्ण राजा बनता है। ऐसी व्यक्तिगत राजसत्ता तथाकथित प्रजातंत्र से श्रेष्ठ होती है, जिसमें कोई प्रशिक्षण
तथा उत्तरदायित्व नहीं होता। आधुनिक प्रजातंत्र के चोर तथा उचक्के जनमत (वोटों) के गोलमाल द्वारा चुनाव लड़ते हैं और विजयी होने पर जनता का भक्षण करते हैं। एक प्रशिक्षित राजा हजारों व्यर्थ के धूर्त मंत्रियों से श्रेष्ठ होता है और यहाँ पर संकेत दिया गया है कि महाराज परीक्षित के से एकछत्र राज्य के उखडऩे से, जनता पर कलियुग के प्रहारों के लिए द्वार खुल जाता है। जनता कभी भी प्रजातंत्र के अति-विज्ञापित रूप में सुखी नहीं रहती। अगले श्लोकों में राजा-विहीन प्रशासन के परिणामों का वर्णन हुआ है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥