श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 18: ब्राह्मण बालक द्वारा महाराज परीक्षित को शाप  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक
धर्मपालो नरपति: स तु सम्राड् बृहच्छ्रवा: ।
साक्षान्महाभागवतो राजर्षिर्हयमेधयाट् ।
क्षुत्तृट्‍श्रमयुतो दीनो नैवास्मच्छापमर्हति ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
धर्म-पाल:—धर्म का रक्षक; नर-पति:—राजा; स:—वह; तु—लेकिन; सम्राट्—सम्राट; बृहत्—अत्यधिक; श्रवा:—प्रसिद्ध; साक्षात्—प्रत्यक्ष रूप से; महा-भागवत:—उच्च-कोटि का भगवद्भक्त; राज-ऋषि:—राजाओं में साधु; हय-मेधयाट्— अश्वमेध यज्ञ करनेवाला; क्षुत्—भूख; तृट्—प्यास; श्रम-युत:—थका-हारा; दीन:—विपत्ति का मारा; न—कभी नहीं; एव— इस प्रकार; अस्मत्—हमारे द्वारा; शापम्—श्राप; अर्हति—के योग्य है ।.
 
अनुवाद
 
 सम्राट परीक्षित एक पवित्र राजा हैं। वे अत्यन्त प्रसिद्ध हैं और उच्चकोटि के भगवद्भक्त हैं। वे राजाओं में सन्त (राजर्षि) हैं और उन्होंने अनेक अश्वमेध यज्ञ किये हैं। जब ऐसा राजा, भूख तथा प्यास का मारा, थका-हारा होता है, तो वह किसी भी तरह से शाप दिये जाने के योग्य नहीं होता।
 
तात्पर्य
 राजपद-सम्बन्धी सामान्य आचार-संहिता बताने के बाद तथा यह जताने के बाद कि राजा कोई त्रुटि नहीं कर सकता, अतएव कभी निन्दनीय नहीं है, मुनि शमीक राजा परीक्षित के विषय में विशेष रूप से कुछ कहना चाह रहे थे। महाराज परीक्षित के विशिष्ट गुणों को यहाँ पर संक्षेप में दिया गया है। यदि राजा परीक्षित की गणना केवल राजा के ही रूप में की जाय, तो वे अत्यन्त विख्यात शासक थे, जिन्होंने राजा के धार्मिक नियमों के अनुसार शासन चलाया। शास्त्रों में समस्त वर्णों तथा आश्रमों के कर्तव्य बताये गये हैं। भगवद्गीता (१८.४३) में क्षत्रिय के जिन गुणों का उल्लेख है, वे सारे के सारे सम्राट परीक्षित में विद्यमान थे। वे भगवान् के महान् भक्त भी थे और स्वरूप-सिद्ध व्यक्ति भी। ऐसे राजा को शाप देना कदापि उचित नहीं है, जब वह भूख और प्यास से थका-माँदा हो। इस तरह शमीक ऋषि ने सब तरह से स्वीकार किया कि महाराज परीक्षित को अत्यन्त अन्यायपूर्वक शाप दिया गया। यद्यपि सारे ब्राह्मण इस घटना से दूर थे, फिर भी उस ब्राह्मण बालक के बचकाना कार्य ने सारे विश्व की स्थिति बदल दी थी। इस प्रकार ब्राह्मण ऋषि शमीक ने संसार की उत्तम व्यवस्था के अध:पतन का सारा उत्तरदायित्व ग्रहण किया।
 
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