श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 18: ब्राह्मण बालक द्वारा महाराज परीक्षित को शाप  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक
अपापेषु स्वभृत्येषु बालेनापक्‍वबुद्धिना ।
पापं कृतं तद्भगवान् सर्वात्मा क्षन्तुमर्हति ॥ ४७ ॥
 
शब्दार्थ
अपापेषु—समस्त पापों से रहित व्यक्ति को; स्व-भृत्येषु—अधीन व्यक्ति को, जिसकी रक्षा की जानी चाहिए; बालेन—बालक द्वारा; अपक्व—अप्रौढ़; बुद्धिना—बुद्धि से; पापम्—पाप-पूर्ण कर्म; कृतम्—किया गया; तत् भगवान्—अतएव भगवान्; सर्व- आत्मा—सर्वव्यापी; क्षन्तुम्—क्षमा के लिए; अर्हति—योग्य हैं ।.
 
अनुवाद
 
 तब ऋषि ने सर्वव्यापी भगवान् से अपने अप्रौढ़ तथा बुद्धिहीन पुत्र को क्षमा करने के लिए प्रार्थना की, जिसने ऐसे व्यक्ति को शाप देने का महान् पाप किया था, जो समस्त पापों से मुक्त था और पराश्रित एवं सभी प्रकार से रक्षा किये जाने के योग्य था।
 
तात्पर्य
 प्रत्येक व्यक्ति अपने पवित्र या पापपूर्ण कार्य के लिए जिम्मेदार होता है। ऋषि शमीक को यह पहले से दिख गया कि उसके पुत्र ने महाराज परीक्षित को शाप देकर महान् पाप किया है, क्योंकि वे एक पवित्र शासक थे और महाभागवत होने के कारण समस्त पापों से मुक्त थे, अतएव वे ब्राह्मणों द्वारा रक्षणीय थे। जब भगवद्भक्त के प्रति अपराध किया जाता है, तो उसके फलों से छुटकारा पाना अत्यन्त कठिन होता है। सामाजिक व्यवस्था के प्रधान पद पर होने के कारण, ब्राह्मणों का कर्तव्य है कि वे अपने आश्रितों को सुरक्षा प्रदान करें, न कि शाप दें। ऐसे अवसर आये हैं, जब ब्राह्मण ने अपने अधीन क्षत्रिय या वैश्य को उग्र शाप दिया है, किन्तु महाराज परीक्षित के साथ कोई ऐसी बात न थी, जैसाकि कहा जा चुका है। मूर्ख बालक ने ब्राह्मण पुत्र होने के नाते, निरे गर्व के कारण ऐसा किया था, अतएव वह ईश्वरी नियम द्वारा दण्ड का भागी था। भगवान् ऐसे व्यक्ति को कभी क्षमा नहीं करते, जो उनके शुद्ध भक्त की अवमानना करता है। अतएव राजा को शाप देकर, मूर्ख शृंगी ने न केवल पाप किया था, अपितु सबसे बड़ा अपराध किया था। अतएव ऋषि देख सके कि केवल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ही उनके पुत्र को इस पाप से बचा सकते हैं। अतएव उन्होंने क्षमा याचना के लिए सीधे भगवान् से प्रार्थना की, क्योंकि भगवान् ही ऐसी बात को मिटा सकते हैं, जिसको बदलना असम्भव होता है। ऋषि ने उस मूर्ख बालक के नाम पर क्षमायाचना की, जिसमें तनिक भी बुद्धि का विकास नहीं हुआ था।

यहाँ पर प्रश्न उठाया जा सकता है कि चूँकि ऐसी भगवान् की इच्छा थी कि महाराज परीक्षित उस विषम परिस्थिति में पड़ें, जिससे इस जगत से उनका उद्धार हो सके, तो फिर क्यों एक ब्राह्मण बालक को इस अपराध के लिए उत्तरदायी ठहराया गया? इसका उत्तर यह है कि यह अपराध एक बालक से ही हुआ था, अतएव उसे आसानी से क्षमा किया जा सकता था। इस तरह पिता की प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। लेकिन यदि यह प्रश्न उठाया जाय कि सारी ब्राह्मण जाति को सांसारिक मामलों में कलि को प्रवेश देने के लिए क्यों उत्तरदायी ठहराया गया, तो इसका उत्तर वराह पुराण में मिलेगा। इसके अनुसार, जो असुर भगवान् के शत्रु थे, किन्तु जो भगवान् द्वारा मारे नहीं गये थे, उन्हें कलियुग का लाभ उठाने के लिए ब्राह्मण परिवारों में जन्म लेने की अनुमति दी गई। परम दयालु भगवान् ने उन सबों को पवित्र ब्राह्मणों के परिवारों में जन्म लेने का अवसर प्रदान किया, जिससे वे मोक्ष-लाभ कर सकें। लेकिन असुरों ने, इस अवसर का लाभ न उठाकर, ब्राह्मण होने के गर्व से फूलकर, ब्राह्मण संस्कृति का दुरुपयोग किया। इसका ज्वलन्त उदाहरण शमीक ऋषि का पुत्र है। इसके द्वारा ब्राह्मणों के सारे मूर्ख पुत्रों को आगाह किया जाता है कि वे शृंगी की तरह मूर्ख न बनें और उन आसुरी गुणों से सदैव बचते रहें, जो उनमें पूर्व जन्म में विद्यमान थे। निस्सन्देह, भगवान् ने इस मूर्ख बालक को क्षमा कर दिया, लेकिन अन्य लोग जिनके पिता शमीक ऋषि जैसे नहीं हैं, वे महान् कष्ट में पड़ते रहेंगे, यदि वे ब्राह्मण कुल में जन्म लेने से प्राप्त होनेवाले लाभों का दुरुपयोग करते हैं।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥