श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 18: ब्राह्मण बालक द्वारा महाराज परीक्षित को शाप  »  श्लोक 49

 
श्लोक
इति पुत्रकृताघेन सोऽनुतप्तो महामुनि: ।
स्वयं विप्रकृतो राज्ञा नैवाघं तदचिन्तयत् ॥ ४९ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; पुत्र—पुत्र; कृत—किया गया; अघेन—पाप से; स:—वे (मुनि); अनुतप्त:—पश्चात्ताप करते हुए; महा- मुनि:—ऋषि; स्वयम्—स्वयं; विप्रकृत:—इस तरह अपमानित होते हुए; राज्ञा—राजा द्वारा; न—नहीं; एव—निश्चय ही; अघम्—पाप; तत्—वह; अचिन्तयत्—सोचा ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार मुनि ने अपने पुत्र द्वारा किये गये पाप के लिए पश्चात्ताप किया। उसने राजा द्वारा किये गये अपमान को गम्भीरता से ग्रहण नहीं किया।
 
तात्पर्य
 अब सारी घटना स्पष्ट हो गई है। महाराज परीक्षित द्वारा मुनि के गले में मृत सर्प लपेटना कोई गम्भीर अपराध न था, किन्तु शृंगी द्वारा राजा को शापित किया जाना गम्भीर अपराध था। यह गम्भीर अपराध एक मूर्ख बालक द्वारा ही हुआ था, अतएव वह परमेश्वर द्वारा क्षम्य था, यद्यपि पाप के फल से मुक्त होना सम्भव न था। महाराज परीक्षित ने भी मूर्ख ब्राह्मण द्वारा दिये गये शाप की ओर ध्यान नहीं
दिया। उल्टे उन्होंने इस विषम स्थिति का लाभ उठाया और भगवान् की महद् इच्छा से, श्रील शुकदेव गोस्वामी की कृपा के माध्यम से जीवन की चरम सिद्धि प्राप्त की। वास्तव में यह भगवदिच्छा थी और इस इच्छापूर्ति में महाराज परीक्षित, ऋषि शमीक तथा उनका पुत्र शृंगी ये तीनों निमित्त मात्र थे। अतएव इनमें से किसी को कठिनाई नहीं हुई, क्योंकि हर काम परम पुरुष के सम्बन्ध में किया गया था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥