श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 18: ब्राह्मण बालक द्वारा महाराज परीक्षित को शाप  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक
तावत्कलिर्न प्रभवेत् प्रविष्टोऽपीह सर्वत: ।
यावदीशो महानुर्व्यामाभिमन्यव एकराट् ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
तावत्—तब तक; कलि:—कलि-रूप; न—नहीं; प्रभवेत्—बढ़ सकता है; प्रविष्ट:—प्रवेश करके; अपि—भी; इह—यहाँ; सर्वत:—सर्वत्र; यावत्—जब तक; ईश:—प्रभु; महान्—महान्; उर्व्याम्—शक्तिशाली; आभिमन्यव:—अभिमन्यु का पुत्र; एक-राट्—अकेला सम्राट ।.
 
अनुवाद
 
 जब तक अभिमन्यु का महान्-शक्तिशाली पुत्र संसार का सम्राट बना हुआ है, तब तक कलि के पनपने की कोई गुंजाइश नहीं है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि पहले बताया जा चुका है, कलि ने इस पृथ्वी में बहुत पहले प्रवेश पा लिया था और वह सारे संसार में अपना प्रभाव फैलाने की ताक में था। किन्तु महाराज परीक्षित की उपस्थिति के कारण वह ऐसा नहीं कर पा रहा था। यही अच्छे प्रशासन का ढंग है। कलि जैसे उपद्रवी तत्त्व सदा ही अपने निन्द्य कृत्यों को फैलाना चाहेंगे, लेकिन सक्षम राज्य का कर्तव्य है कि सभी प्रकार से इन्हें रोके। यद्यपि महाराज परीक्षित ने कलि के लिए कुछ स्थान नियत कर दिये थे, किन्तु उसी के साथ-साथ उन्होंने प्रजा को इसका अवसर नहीं दिया कि वे कलि के प्रभाव में बह जाँय।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥