श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 18: ब्राह्मण बालक द्वारा महाराज परीक्षित को शाप  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक
नानुद्वेष्टि कलिं सम्राट् सारङ्ग इव सारभुक् ।
कुशलान्याशु सिद्ध्यन्ति नेतराणि कृतानि यत् ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
न—कभी नहीं; अनुद्वेष्टि—ईर्ष्यालु; कलिम्—कलि को; सम्राट्—सम्राट; सारम्-ग—मधुमक्खियों की भाँति यथार्थवादी; इव—सदृश; सार-भुक्—सार को ग्रहण करनेवाला; कुशलानि—शुभ वस्तुएँ; आशु—शीघ्र; सिद्ध्यन्ति—सफल होते हैं; न— कभी नहीं; इतराणि—अशुभ; कृतानि—किये जाने पर; यत्—जितना ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज परीक्षित मधुमक्खियों की तरह यथार्थवादी थे, जो केवल (पुष्प के) सार को ग्रहण करती हैं। वे यह भलीभाँति जानते थे कि इस कलियुग में कल्याणकारी वस्तुएँ तुरन्त ही अपना शुभ प्रभाव डालती हैं, जबकि अशुभ कर्मों को वास्तविक रूप में सम्पन्न करना पड़ता है (जिससे प्रभाव जमा सकें)। अतएव उन्होंने कभी भी कलि से ईर्ष्या नहीं की।
 
तात्पर्य
 कलियुग अधम युग कहलाता है। इस अधम युग में सारे जीव विचित्र स्थिति में रहते हैं, अतएव भगवान् ने उन्हें कुछ विशेष सुविधाएँ दे रखी हैं। अत: भगवान् की कृपा से, जब तक जीव किसी पाप-पूर्ण कार्य को वास्तव में करता नहीं है, तब तक वह उस कर्म का भागी नहीं होता। अन्य युगों में पाप-पूर्ण कर्म का विचार करने से ही मनुष्य कर्म-फल का भागी बन जाता था। इसके विपरीत, इस युग में जीव को शुभ कर्म के चिन्तन मात्र से ही उसका फल प्राप्त हो जाता है। अतएव, अत्यन्त विद्वान एवं अनुभवी राजा होने के कारण, महाराज परीक्षित कलि से कोई अनावश्यक द्वेष नहीं रखते थे, क्योंकि वे उसे कोई पाप-कर्म करने का अवसर ही नहीं देना चाहते थे। उन्होंने अपनी प्रजा को कलियुग के पाप-कर्मों में पडऩे से बचाया और साथ ही उन्होंने कलि के लिए कुछ स्थान नियत करके उसे भी पूरी सुविधा प्रदान की। श्रीमद्भागवत के अन्त में कहा गया है कि यद्यपि कलि के निन्द्य कृत्य विद्यमान हैं, तो भी कलियुग में बड़े-बड़े लाभ भी हैं। मनुष्य मात्र भगवन्नाम के जप-कीर्तन द्वारा मोक्ष-लाभ प्राप्त कर सकता है। अतएव महाराज परीक्षित ने भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन के प्रचार हेतु संगठित प्रयास किया और उन्होंने जनता को कलि के पाश से बचा लिया। इसी लाभ के कारण कभी-कभी बड़े-बड़े मुनि कलियुग की जय मनाते हैं। वेदों में भी कहा गया है कि भगवान् कृष्ण की लीलाओं की चर्चा से मनुष्य कलियुग की सारी बुराइयों से छुटकारा पा सकता है। श्रीमद्भागवत के आरम्भ में यह भी कहा गया है कि श्रीमद्भागवत के पाठ से परमेश्वर मनुष्य के हृदय में स्थापित हो जाते हैं। ये कलियुग के कुछ लाभ हैं और महाराज परीक्षित ने इन सशक्त लाभों को ग्रहण किया और असली वैष्णव होने के नाते, उन्होंने कलियुग का बुरा नहीं सोचा।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥