श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 19: शुकदेव गोस्वामी का प्रकट होना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
अन्ये च देवर्षिब्रह्मर्षिवर्या
राजर्षिवर्या अरुणादयश्च ।
नानार्षेयप्रवरान् समेता-
नभ्यर्च्य राजा शिरसा ववन्दे ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
अन्ये—अन्य अनेक; च—भी; देवर्षि—देवताओं में ऋषि; ब्रह्मर्षि—ऋषितुल्य ब्राह्मण; वर्या:—सर्वश्रेष्ठ; राजर्षि-वर्या:— राजर्षियों में श्रेष्ठ; अरुण-आदय:—राजर्षियों में विशिष्ट पद; च—तथा; नाना—अन्य अनेक; आर्षेय-प्रवरान्—ऋषिवंशों में श्रेष्ठ; समेतान्—एकसाथ, समूहित; अभ्यर्च्य—पूजा करके; राजा—सम्राट ने; शिरसा—भूमि पर सिर झुकाकर; ववन्दे— प्रणाम किया ।.
 
अनुवाद
 
 इनके अतिरिक्त वहाँ अन्य अनेक देवर्षि, राजा तथा विभिन्न मुनियों के वंशज विशिष्ट राजा आये थे, जिन्हें अरुणादय कहा जाता है। जब वे सब सम्राट (परीक्षित) से मिलने के लिए एकत्र हुए, तो राजा ने सबको शीश नमाकर प्रणाम करते हुए समुचित ढंग से उनका स्वागत किया।
 
तात्पर्य
 गुरुजनों को आदर करने के लिए सिर को भूमि तक झुकाने की प्रथा अत्यन्त उत्तम शिष्टाचार है, जिससे अतिथि अपने को अत्यधिक सम्मानित समझते हैं। यहाँ तक कि उच्च-कोटि के अपराधी के ऐसा करने पर उसे क्षमा कर दिया जाता है और महाराज परीक्षित तो समस्त ऋषियों तथा राजाओं द्वारा अत्यधिक सम्मानित थे। उन्होंने इन समस्त महापुरुषों का विनीत भाव से स्वागत किया, जिससे वे अपने अपराधों के लिए क्षमा किये जा सकें। सामान्यतया जीवन की अन्तिम अवस्था में यह विनीत विधि प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति द्वारा अपनाई जाती है, जिससे प्रयाण के पूर्व उसे क्षमा किया जा सके। इस प्रकार से महाराज परीक्षित ने भगवद्धाम वापस जाने के लिए सबों की शुभ कामनाएँ प्राप्त कीं।
 
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