श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 19: शुकदेव गोस्वामी का प्रकट होना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
सुखोपविष्टेष्वथ तेषु भूय:
कृतप्रणाम: स्वचिकीर्षितं यत् ।
विज्ञापयामास विविक्तचेता
उपस्थितोऽग्रेऽभिगृहीतपाणि: ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
सुख—सुखपूर्वक; उपविष्टेषु—सभी बैठे हुए; अथ—तत्पश्चात्; तेषु—उनको (आगन्तुकों को); भूय:—फिर; कृत-प्रणाम:— प्रणाम करके; स्व—अपना; चिकीर्षितम्—उपवास का निर्णय; यत्—जो; विज्ञापयाम् आस—प्रस्तुत किया; विविक्त-चेता:— सांसारिक मामलों से जिसका मन विरक्त है; उपस्थित:—उपस्थित होकर; अग्रे—उनके सामने; अभिगृहीत-पाणि:—विनीतभाव से हाथ जोड़े ।.
 
अनुवाद
 
 जब सारे ऋषियों तथा अन्य लोगों ने सुखपूर्वक आसन ग्रहण कर लिया, तो उनके समक्ष हाथ जोडक़र खड़े हुए राजा ने आमरण व्रत करने का अपना संकल्प बतलाया।
 
तात्पर्य
 यद्यपि राजा ने पहले ही गंगा तट पर उपवास करने का निश्चय कर लिया था, किन्तु वहाँ पर उपस्थित महापुरुषों का अभिमत जानने के लिए नियमपूर्वक अपना निर्णय व्यक्त किया। कोई भी निर्णय कितना भी महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, किसी न किसी अधिकारी द्वारा पुष्ट होना चाहिए। इससे बात पक्की हो जाती है। इसका अर्थ यह हुआ कि उन दिनों जो राजा पृथ्वी पर शासन करते थे, वे गैर जिम्मेदार तानाशाह नहीं होते थे। वे वैदिक आदेशों के अनुसार सन्तों तथा मुनियों के प्रामाणिक निर्णयों का पालन करते थे। एक पूर्ण राजा के रूप में महाराज परीक्षित ने अपने जीवन के अन्तिम दिनों तक आचार्यों की सलाह लेकर नियमों का पालन किया।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥