श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 19: शुकदेव गोस्वामी का प्रकट होना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
तस्यैव मेऽघस्य परावरेशो
व्यासक्तचित्तस्य गृहेष्वभीक्ष्णम् ।
निर्वेदमूलो द्विजशापरूपो
यत्र प्रसक्तो भयमाशु धत्ते ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—उसका; एव—निश्चय ही; मे—मेरा; अघस्य—पापी का; परा—दिव्य; अवर—संसारी; ईश:—नियन्ता, भगवान्; व्यासक्त—अत्यधिक आसक्त; चित्तस्य—मन का; गृहेषु—घेरलू मामलों में; अभीक्ष्णम्—सदैव; निर्वेद-मूल:—वैराग्य का कारण; द्विज-शाप—ब्राह्मण द्वारा दिया गया शाप; रूप:—के रूप में; यत्र—जहाँ; प्रसक्त:—प्रभावित; भयम्—भय; आशु— शीघ्र; धत्ते—घटित होते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 आध्यात्मिक तथा प्राकृत जगतों के नियन्ता भगवान् ने ब्राह्मण-शाप के रूप में मुझ पर अत्यन्त कृपा की है। गृहस्थ जीवन में अत्यधिक आसक्त रहने के कारण, मुझे बचाने के लिए भगवान् मेरे समक्ष इस तरह प्रकट हुए हैं कि मैं भयवश अपने आपको संसार से विरक्त कर लूँ।
 
तात्पर्य
 महाराज परीक्षित यद्यपि महान् भक्त पाण्डवों के परिवार में उत्पन्न हुए थे और यद्यपि उन्हें भगवान् का सान्निध्य प्राप्त करने के लिए दिव्य आसक्ति की शिक्षा प्राप्त थी, तो भी उन्हें संसारी गृहस्थ जीवन का आकर्षण इतना प्रबल लग रहा था कि उन्हें भगवान् की योजना द्वारा विलग किया जाना पड़ा। भगवान् विशिष्ट भक्त के लिए ही ऐसी प्रत्यक्ष कार्यवाही करते हैं। महाराज परीक्षित, ब्रह्माण्ड भर से आये श्रेष्ठ अध्यात्मवादियों की उपस्थिति से इसे समझ सके। भगवान् अपने भक्तों के साथ निवास करते हैं, अतएव बड़े-बड़े सन्तों की उपस्थिति भगवान् की उपस्थिति की सूचक थी। अतएव राजा ने महर्षियों की उपस्थिति को परमेश्वर के अनुग्रह का संकेत मानकर उनका स्वागत किया।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥