श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 19: शुकदेव गोस्वामी का प्रकट होना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
तं मोपयातं प्रतियन्तु विप्रा
गङ्गा च देवी धृतचित्तमीशे ।
द्विजोपसृष्ट: कुहकस्तक्षको वा
दशत्वलं गायत विष्णुगाथा: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—इस कारण; मा—मुझको; उपयातम्—शरणागत को; प्रतियन्तु—स्वीकार करें; विप्रा:—हे ब्राह्मणों; गङ्गा—गंगा माता; च—भी; देवी—भगवान् की प्रत्यक्ष प्रतिनिधि; धृत—धारण किया; चित्तम्—हृदय; ईशे—भगवान् में; द्विज-उपसृष्ट:—ब्राह्मण द्वारा उत्पन्न; कुहक:—चमत्कार; तक्षक:—तक्षक नाग; वा—या; दशतु—काटे; अलम्—अविलम्ब; गायत—कृपया गाते रहें; विष्णु-गाथा:—विष्णु के कार्यों की कथा ।.
 
अनुवाद
 
 हे ब्राह्मणों, आप मुझे पूर्ण रूप से शरणागत के रूप में स्वीकार करें और भगवान् की प्रतिनिधि-स्वरूपा माँ गंगा भी मुझे इसी रूप में स्वीकार करें, क्योंकि मैं पहले से अपने हृदय में भगवान् के चरणकमलों को धारण किये हूँ। अब चाहे तक्षक नाग, या ब्राह्मण द्वारा उत्पन्न कोई भी चमत्कारी वस्तु, मुझे तुरन्त डस ले। मेरी एकमात्र इच्छा यह है कि आप सब भगवान् विष्णु की लीलाओं का गायन करते रहें।
 
तात्पर्य
 ज्योंही कोई परमेश्वर के चरणकमलों में पूर्ण रूप से समर्पित हो जाता है, तो वह मृत्यु से तनिक भी भयभीत नहीं होता। गंगा नदी के तट पर भगवद्भक्तों की उपस्थिति से तथा महाराज परीक्षित द्वारा भगवान् के चरणकमलों में पूर्ण शरणागति से उत्पन्न वातावरण इस बात की गारंटी थी कि राजा भगवद्धाम वापस जा रहे हैं। इस तरह वे मृत्यु के भय से सर्वथा मुक्त हो गये।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥