श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 19: शुकदेव गोस्वामी का प्रकट होना  »  श्लोक 21

 
श्लोक
सर्वे वयं तावदिहास्महेऽथ
कलेवरं यावदसौ विहाय ।
लोकं परं विरजस्कं विशोकं
यास्यत्ययं भागवतप्रधान: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
सर्वे—सभी; वयम्—हमारा; तावत्—तब तक; इह—इस स्थान पर; आस्महे—रुकेंगे; अथ—तत्पश्चात्; कलेवरम्—शरीर; यावत्—जब तक; असौ—राजा; विहाय—त्यागकर; लोकम्—लोक को; परम्—परम; विरजस्कम्—संसारी कल्मष से सर्वथा मुक्त; विशोकम्—सभी प्रकार के शोक से पूर्ण रूप से मुक्त; यास्यति—लौटता है; अयम्—यह; भागवत—भक्त; प्रधान:— प्रमुख ।.
 
अनुवाद
 
 हम सभी यहाँ पर तब तक प्रतीक्षा करेंगे, जब तक भगवान् के प्रमुख भक्त महाराज परीक्षित परम लोक को लौट नहीं जाते, जो समस्त संसारी कल्मष तथा समस्त प्रकार के शोक से पूर्ण रूप से मुक्त है।
 
तात्पर्य
 भौतिक सृष्टि, जिसकी तुलना आकाश के बादल से की गई है, उसकी सीमा से परे परव्योम अर्थात् आध्यात्मिक आकाश है, जो वैकुण्ठ नामक ग्रहों से भरा हुआ है। ऐसे वैकुण्ठ ग्रह भी भिन्न-भिन्न नामों से जाने जाते हैं यथा पुरुषोत्तमलोक, अच्युतलोक, त्रिविक्रमलोक, हृषीकेशलोक, केशवलोक, अनिरुद्धलोक, माधवलोक, प्रद्युम्नलोक, संकर्षणलोक, श्रीधरलोक, वासुदेवलोक, अयोध्यालोक, द्वारकालोक तथा अन्य अनेकानेक लाखों आध्यात्मिक लोक जहाँ भगवान् अधिष्ठाता हैं। वहाँ के सारे जीव मुक्त आत्मा हैं और उनके शरीर भगवान् के ही समान आध्यात्मिक हैं। वहाँ भौतिक कल्मष नहीं है, हर वस्तु आध्यात्मिक है। अतएव वहाँ कुछ भी शोक करने योग्य नहीं है। ये लोक दिव्य आनन्द से पूर्ण हैं। वहाँ न जन्म है, न जरा, न मृत्यु और न रोग है। उपर्युक्त समस्त वैकुण्ठलोकों में एक परम लोक है, जो गोलोक वृन्दावन कहलाता
है, जो भगवान् श्रीकृष्ण तथा विशिष्ट पार्षदों का धाम है। महाराज परीक्षित के लिए यह विशिष्ट धाम पूर्वनिश्चित था और वहाँ पर एकत्र हुए सारे ऋषि इसे पहले से देख सकते थे। वे सभी महान् राजा के महाप्रस्थान के विषय में परस्पर बातें कर रहे थे और वे उन्हें अन्तिम क्षण तक देखना चाह रहे थे, क्योंकि उन्हें फिर ऐसा महान् भगवद्भक्त देखने को नहीं मिलेगा। जब भगवान् का कोई बड़ा भक्त दिवंगत होता है, तो इसमें शोक करने के लिए कुछ नहीं होता, क्योंकि भक्त का भगवद्धाम में प्रवेश पूर्वनिश्चित है। लेकिन दुख की बात तो यह है कि ऐसा महान् भक्त हमारी दृष्टि से ओझल हो जाता है। अतएव दुखी होने की बात तो है ही। जिस तरह भगवान् विरले ही हमारी इन आँखों से दिखते हैं, उसी तरह महान् भक्त भी। अत: महर्षियों ने ठीक ही अपने-अपने स्थानों पर अन्तिम क्षण तक रहने का निश्चय किया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥