श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 19: शुकदेव गोस्वामी का प्रकट होना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
अद्यैव राज्यं बलमृद्धकोशं
प्रकोपितब्रह्मकुलानलो मे ।
दहत्वभद्रस्य पुनर्न मेऽभूत्
पापीयसी धीर्द्विजदेवगोभ्य: ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
अद्य—आज; एव—ही; राज्यम्—राज्य; बलम् ऋद्ध—बल तथा धन; कोशम्—खजाना; प्रकोपित—प्रज्ज्वलित; ब्रह्म-कुल— ब्राह्मण कुल द्वारा; अनल:—अग्नि; मे दहतु—मुझे जला दे; अभद्रस्य—अशुभ; पुन:—फिर; न—नहीं; मे—मुझको; अभूत्— होए; पापीयसी—पापपूर्ण; धी:—बुद्धि; द्विज—ब्राह्मण; देव—भगवान्; गोभ्य:—तथा गायों के प्रति ।.
 
अनुवाद
 
 मैं ब्राह्मण सभ्यता, ईश्वर चेतना तथा गोरक्षा के प्रति उपेक्षा करने के फलस्वरूप अशिष्ट तथा पापी हूँ। अतएव मैं चाहता हूँ कि मेरा राज्य, मेरा पराक्रम तथा मेरा धन ब्राह्मण की क्रोधाग्नि से तुरन्त भस्म हो जाय, जिससे भविष्य में ऐसे अशुभ विचारों से मेरा मार्गदर्शन न होने पाए।
 
तात्पर्य
 प्रगतिशील मानवीय सभ्यता ब्राह्मण संस्कृति, ईश्वरीय चेतना तथा गोरक्षा पर आधारित है। उपर्युक्त सिद्धान्तों के सम्बन्ध में ही व्यापार, वाणिज्य, कृषि तथा उद्योगों के द्वारा राज्य के सारे आर्थिक विकास को पूरी तरह उपयोग में लाना चाहिए, अन्यथा सारे तथाकथित आर्थिक विकास अवनति के साधन बन जाते हैं। गो-रक्षा का अर्थ है ब्राह्मण संस्कृति को भोजन प्रदान करना, जिससे ईश्वर चेतना प्राप्त होती है और इस तरह मानवीय सभ्यता में पूर्णता आती है। कलियुग का लक्ष्य जीवन के उच्चआदर्शों को विनष्ट करना है और यद्यपि महाराज परीक्षित ने संसार के भीतर कलि के वर्चस्व का बलपूर्वक प्रतिरोध किया, किन्तु कलि का प्रभाव उपयुक्त समय में प्रकट हुआ, जिससे महाराज परीक्षित जैसे प्रबल राजा से भूख तथा प्यास की थोडी सी उत्तेजना के कारण ब्राह्मण संस्कृति की अवमानना हो गयी। महाराज परीक्षित ने इस आकस्मिक घटना के प्रति पश्चात्ताप किया और उन्होंने कामना की कि उनका सारा राज्य, उनका बल तथा उनका कोष, यदि वह ब्राह्मण संस्कृति के काम नहीं आता, तो जलकर भस्म हो जाय।

जहाँ कहीं सम्पत्ति तथा शक्ति का सदुपयोग ब्राह्मण संस्कृति, ईश्वर चेतना तथा गोरक्षा के उन्नयन के लिए नहीं होता, वह राज्य तथा वह घर निश्चित रूप से विनष्ट हो जाता है। यदि हम विश्व में शान्ति तथा सम्पन्नता चाहते हैं, तो हमें इस श्लोक से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। प्रत्येक राज्य तथा प्रत्येक घर को आत्म-शुद्धि के लिए ब्राह्मण संस्कृति को, आत्म-साक्षात्कार के लिए ईश्वर चेतना को तथा पूर्ण सभ्यता को चालू रखने के लिए पर्याप्त दूध तथा उत्तम भोजन प्राप्त करने के लिए गोरक्षा को प्रश्रय देने का प्रयास करना चाहिए।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥