श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 19: शुकदेव गोस्वामी का प्रकट होना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक
अपि मे भगवान् प्रीत: कृष्ण: पाण्डुसुतप्रिय: ।
पैतृष्वसेयप्रीत्यर्थं तद्गोत्रस्यात्तबान्धव: ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
अपि—निश्चित रूप से; मे—मुझको; भगवान्—भगवान्; प्रीत:—प्रसन्न; कृष्ण:—भगवान्; पाण्डु-सुत—राजा पाण्डु के पुत्र; प्रिय:—प्रिय; पैतृ—पिता से सम्बन्धित; स्वसेय—बहन के बेटे; प्रीति—सन्तोष; अर्थम्—के सम्बन्ध में; तत्—उनका; गोत्रस्य—वंशज; आत्त—स्वीकृत; बान्धव:—मित्र के रूप में ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् कृष्ण जो राजा पाण्डु के पुत्रों को अत्यन्त प्रिय हैं, उन्होंने अपने महान् भाँजों तथा भाइयों को प्रसन्न करने के लिए मुझे भी सम्बन्धी की तरह स्वीकार किया है।
 
तात्पर्य
 एक विशुद्ध अनन्य भगवद्भक्त अपने परिवार की सेवा, झूठे पारिवारिक मामलों में आसक्तों की अपेक्षा, अधिक अच्छे ढंग से करता है। सामान्यतया लोग पारिवारिक मामलों में आसक्त रहते हैं और मानव समाज का सारा आर्थिक प्रेरक बल पारिवारिक मोह के वशीभूत होकर चलता है। ऐसे मोहग्रस्त लोगों को इतनी जानकारी नहीं रहती कि वे भगवद्भक्त बनकर परिवार की अधिक अच्छी सेवा कर सकते हैं। भगवान् अपने भक्त के पारिवारिक सदस्यों तथा वंशजों को विशेष सुरक्षा प्रदान करते हैं, भले ही ये सदस्य स्वयं अभक्त क्यों न हों! महाराज प्रह्लाद भगवान् के महान् भक्त थे, लेकिन उनका पिता हिरण्यकशिपु घोर नास्तिक तथा घोषित रूप से भगवान् का शत्रु था। किन्तु इतना सारा होते हुए भी, हिरण्यकशिपु को मोक्ष प्रदान किया गया, क्योंकि वह महाराज प्रह्लाद का पिता था। भगवान् इतने दयालु हैं कि वे अपने भक्त के परिवारजनों को सारी सुरक्षा प्रदान करते हैं, जिससे भक्त को अपने परिवार के विषय में चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं रह जाती, यहाँ तक कि चाहे भक्ति करने के लिए वह ऐसे सदस्यों को छोड़ भी दे। महाराज युधिष्ठिर तथा उनके भाई कुन्ती के पुत्र थे और कुन्ती कृष्ण की बुआ थीं। महाराज परीक्षित महान् पाण्डवों के एकमात्र पौत्र होने के कारण, भगवान् कृष्ण का संरक्षण स्वीकार करते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥