श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 19: शुकदेव गोस्वामी का प्रकट होना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक
अन्यथा तेऽव्यक्तगतेर्दर्शनं न: कथं नृणाम् ।
नितरां म्रियमाणानां संसिद्धस्य वनीयस: ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
अन्यथा—अन्यथा; ते—आपका; अव्यक्त-गते:—अदृश्य गतिविधियों वाले का; दर्शनम्—मिलाप, भेंट; न:—हमारे लिए; कथम्—कैसे; नृणाम्—लोगों का; नितराम्—विशेष रूप से; म्रियमाणानाम्—मरणासन्नों का; संसिद्धस्य—परम पूर्ण का; वनीयस:—स्वेच्छा से प्राकट्य ।.
 
अनुवाद
 
 अन्यथा (भगवान् कृष्ण की प्रेरणा के बिना) यह कैसे सम्भव है कि आप स्वेच्छा से यहाँ प्रकट हुए, जबकि आप सामान्य लोगों से ओझल रहकर विचरण करते हैं और हम मरणासन्नों को दृष्टिगोचर नहीं होते।
 
तात्पर्य
 निश्चित ही महर्षि शुकदेव गोस्वामी भगवान् कृष्ण द्वारा प्रेरित होकर महान् भगवद्भक्त महाराज परीक्षित के समक्ष स्वेच्छा से प्रकट हुए थे, जिससे उन्हें श्रीमद्भागवत की शिक्षा दे सकें। मनुष्य अपने गुरु तथा भगवान् की कृपा से ही भगवान् की भक्ति के सार को प्राप्त कर सकता है। गुरु भगवान् के व्यक्त प्रतिनिधि होते हैं, जो उसे अन्तिम सफलता प्राप्त करने में सहायता करते हैं। जिसे भगवान् अधिकार नहीं देते, वह गुरु नहीं बन सकता। श्रील शुकदेव गोस्वामी प्रधिकृत गुरु थे, अतएव भगवान् ने उन्हें प्रेरणा दी कि वे महाराज परीक्षित के समक्ष प्रकट हों तथा उन्हें श्रीमद्भागवत की शिक्षाएँ दें। मनुष्य यदि भगवान् के भेजे गये प्रधिकृत प्रतिनिधि का कृपापात्र होता है, तो वह भगवद्धाम जाने की चरम सिद्धि प्राप्त कर सकता है। ज्योंही भगवद्भक्त की भेंट भगवान् के असली प्रतिनिधि से होती है, त्योंही वह इस शरीर को त्यागने के बाद भगवद्धाम जाने की गारंटी पा जाता है। किन्तु यह भक्त की खुद की निष्ठा पर निर्भर करता है। भगवान् सभी जीवों के हृदयों में विद्यमान हैं, अतएव वे हर व्यक्ति की गतिविधियों से अवगत रहते हैं। ज्योंही भगवान् देखते हैं कि कोई जीव भगवद्धाम जाने के लिए अत्यधिक उत्सुक है, तो भगवान् तुरन्त ही अपना प्रामाणिक प्रतिनिधि भेजते हैं। इस प्रकार निष्ठावान भक्त का भगवद्धाम जाना सुनिश्चित हो जाता है। निष्कर्ष यह है कि प्रामाणिक गुरु की सहायता प्राप्त करने का अर्थ है, साक्षात् भगवान् से प्रत्यक्ष सहायता प्राप्त करना।
 
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