श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 19: शुकदेव गोस्वामी का प्रकट होना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
तत्रोपजग्मुर्भुवनं पुनाना
महानुभावा मुनय: सशिष्या: ।
प्रायेण तीर्थाभिगमापदेशै:
स्वयं हि तीर्थानि पुनन्ति सन्त: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
तत्र—वहाँ; उपजग्मु:—पहुँचा; भुवनम्—ब्रह्माण्ड को; पुनाना:—पवित्र करनेवाले; महा-अनुभावा:—बड़े-बड़े मेधावी; मुनय:—विचारक; स-शिष्या:—अपने शिष्यों समेत; प्रायेण—प्राय:; तीर्थ—तीर्थस्थान; अभिगम—यात्रा; अपदेशै:—के बहाने से; स्वयम्—स्वयं; हि—निश्चय ही; तीर्थानि—तीर्थयात्रा से सारे स्थान; पुनन्ति—पवित्र बनाते हैं; सन्त:—मुनिगण ।.
 
अनुवाद
 
 उस अवसर पर बड़े-बड़े मेधावी विचारक, अपने शिष्यों के संग एवं अपनी उपस्थिति के द्वारा तीर्थ-स्थानों को निश्चय ही पवित्र करनेवाले मुनिगण तीर्थयात्रा के बहाने वहाँ आ पहुँचे।
 
तात्पर्य
 जब महाराज परीक्षित गंगा के तट पर बैठ गये, तो यह समाचार ब्रह्माण्ड में चारों दिशाओं में फैल गया और अत्यन्त मेधावी मुनिगण, जो इस अवसर के महत्त्व को समझ सकते थे, तीर्थयात्रा का बहाना करके वहाँ आ पहुँचे। वास्तव में वे महाराज परीक्षित से भेंट करने आये थे, स्नान-यात्रा करने नहीं आये थे, क्योंकि वे सभी तीर्थों को पवित्र करने में सक्षम थे। सामान्य लोग अपने समस्त पापों को धोने के लिए तीर्थस्थानों में जाते हैं। इस तरह तीर्थस्थल अन्यों के पापों से बोझिल हो उठते हैं। किन्तु जब ऐसे मुनि बोझिल तीर्थ-स्थानों की यात्रा करते हैं, तो वे अपनी उपस्थिति से उन स्थानों को पवित्र बनाते हैं। अतएव जो मुनि महाराज परीक्षित से भेंट करने आये, उन्हें सामान्य व्यक्तियों की भाँति अपने को शुद्ध करने की परवाह नहीं थी, अपितु वे उस स्थान में स्नान करने के बहाने महाराज परीक्षित से भेंट करने आये थे, क्योंकि उन्होंने यह पूर्वानुमान लगा लिया था कि शुकदेव गोस्वामी द्वारा श्रीमद्भागवत का प्रवचन होगा। वे सभी इस महान् अवसर का लाभ उठाना चाहते थे।
 
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