श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 2: दिव्यता तथा दिव्य सेवा  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक
सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तै-
र्युक्त: पर: पुरुष एक इहास्य धत्ते ।
स्थित्यादये हरिविरिञ्चिहरेति संज्ञा:
श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्वतनोर्नृणां स्यु: ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
सत्त्वम्—सत्त्वगुण; रज:—रजोगुण; तम:—तमोगुण; इति—इस प्रकार; प्रकृते:—प्रकृति के; गुणा:—गुण; तै:—उनके द्वारा; युक्त:—समन्वित; पर:—दिव्य; पुरुष:—पुरुष; एक:—एक; इह अस्य—इस भौतिक जगत का; धत्ते—स्वीकार करता है; स्थिति-आदये—उत्पत्ति, पालन तथा संहार आदि को; हरि—विष्णु भगवान्; विरिञ्चि—ब्रह्मा; हर—शिवजी; इति—इस प्रकार; संज्ञा:—विभिन्न स्वरूप; श्रेयांसि—चरम लाभ; तत्र—वहाँ; खलु—निस्सन्देह; सत्त्व—सात्त्विक; तनो:—रूप; नृणाम्—मनुष्यों का; स्यु:—प्राप्त किया ।.
 
अनुवाद
 
 दिव्य भगवान् प्रकृति के तीन गुणों—सत्त्व, रज तथा तम—से अप्रत्यक्ष रूप से सम्बद्ध हैं और वे भौतिक जगत की उत्पत्ति, पालन तथा संहार के लिए ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव, इन तीन गुणात्मक रूपों को ग्रहण करते हैं। इन तीनों रूपों में से सत्त्व गुण वाले विष्णु से सारे मनुष्य परम लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
 
तात्पर्य
 पहले जैसा यह कहा गया है कि भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति उनके पूर्ण अंशों के रूप में की जाय, उसकी पुष्टि इस कथन द्वारा होती है। भगवान् श्रीकृष्ण तथा उनके सर्व पूर्ण अंश विष्णु-तत्त्व हैं। श्रीकृष्ण के बाद अगला प्राकट्य बलदेव का होता है, बलदेव के बाद संकर्षण, संकर्षण के बाद नारायण और नारायण से दूसरे संकर्षण, तब इन संकर्षण से विष्णु पुरुष-अवतार का प्राकट्य होता है। विष्णु अथवा सत्त्व गुण के विग्रह इस भौतिक जगत के पुरुष अवतार हैं और क्षीरोदकशायी विष्णु या परमात्मा नाम से जाने जाते हैं। ब्रह्मा रजस् के विग्रह हैं और शिव तमस् के। ये तीनों इस भौतिक जगत के तीनों गुणों के विभागाध्यक्ष हैं। विष्णु के सत्त्वगुण से इस सृष्टि का प्राकट्य सम्भव होता है और जब इसे विनष्ट करना होता है, तो शिवजी अपने ताण्डव नृत्य से इसे नष्ट कर देते हैं। भौतिकतावादी तथा मूर्ख मनुष्य क्रमश: ब्रह्मा तथा शिव की पूजा करते हैं। किन्तु विशुद्ध अध्यात्मवादी सत्त्वगुण के रूप विष्णु की पूजा उनके विविध रूपों में करते हैं। विष्णु परमात्मा के लाखों-करोड़ों अभिन्न तथा भिन्न रूपों में प्रकट होते हैं। अभिन्न रूप ईश्वर कहलाते हैं और भिन्न रूप जीव कहलाते हैं। ‘जीव’ तथा ‘ईश्वर’ दोनों के ही अपने मूल आध्यात्मिक रूप होते हैं। जीव कभी-कभी भौतिक शक्ति के वशीभूत होते रहते हैं, किन्तु विष्णु के रूप सदैव इस शक्ति को अपने वश में रखते हैं। जब भगवान् विष्णु इस भौतिक जगत में प्रकट होते हैं, तो वे माया के वशीभूत बद्धजीवों का उद्धार करने के लिए आते हैं। ऐसे जीव इस भौतिक जगत में स्वामी (प्रभु) बनने की आन्तरिक इच्छा लेकर आते हैं और इस तरह वे प्रकृति के तीन गुणों में फँस जाते हैं। फल स्वरूप जीवों को विविध अवधि का बन्दी जीवन बिताने के लिए अपना भौतिक आवरण बदलते रहना पड़ता है। इस भौतिक जगत का बन्दीगृह भगवान् के आदेश से ब्रह्मा द्वारा सृजित होता है और एक कल्प के अंत में शिवजी द्वारा सारी वस्तुएँ नष्ट कर दी जाती हैं। किन्तु जहाँ तक इस बन्दीगृह की देखभाल का प्रश्न है, वह विष्णु द्वारा उसी प्रकार सम्पन्न किया जाता है, जिस तरह राज्यसत्ता द्वारा बन्दीगृह की देखभाल की जाती है। अतएव जो भी व्यक्ति जन्म, मृत्यु, रोग तथा वृद्धावस्था जैसे संतापों से पूर्ण इस संसार रूपी बन्दीगृह से छूटना चाहता है, उसे ऐसी मुक्ति के लिए भगवान् विष्णु को प्रसन्न करना चाहिए। भगवान् विष्णु की पूजा भक्तिमय सेवा द्वारा ही सम्भव है, किन्तु यदि कोई इस भवरूपी बन्दीगृह-जीवन को चालू रखना चाहता है तो वह ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, वरुण जैसे विभिन्न देवताओं से क्षणिक सुख के लिए तत्सम्बन्धी सुविधाओं की याचना कर सकता है। किन्तु कोई भी देवता बन्दी जीव को इस जगत के बद्ध जीवन से नहीं छुड़ा सकता। केवल विष्णु ही इसे कर सकते हैं। अतएव चरम लाभ भगवान् विष्णु से ही प्राप्त किया जा सकता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥