श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 2: दिव्यता तथा दिव्य सेवा  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
भेजिरे मुनयोऽथाग्रे भगवन्तमधोक्षजम् ।
सत्त्वं विशुद्धं क्षेमाय कल्पन्ते येऽनु तानिह ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
भेजिरे—की सेवा; मुनय:—मुनियों ने; अथ—इस प्रकार; अग्रे—पूर्वकाल में; भगवन्तम्—भगवान् के प्रति; अधोक्षजम्—अध्यात्म, गुणातीत; सत्त्वम्—अस्तित्व; विशुद्धम्—प्रकृति के तीनों गुणों से परे; क्षेमाय—परम लाभ प्राप्त करने के लिए; कल्पन्ते—योग्य हैं; ये—जो; अनु—अनुसरण करते हैं; तान्—वे; इह—इस संसार में ।.
 
अनुवाद
 
 पूर्वकाल में समस्त महामुनियों ने भगवान् की सेवा की, क्योंकि वे प्रकृति के तीनों गुणों से परे हैं। उन्होंने भौतिक परिस्थितियों से मुक्त होने के लिए और फलस्वरूप परम लाभ प्राप्त करने के लिए पूजा की। अतएव जो कोई इन महामुनियों का अनुसरण करता है वह भी इस भौतिक संसार में मोक्ष का अधिकारी बन जाता है।
 
तात्पर्य
 धर्माचरण का प्रयोजन न तो भौतिक लाभ प्राप्त करना है, न ही आत्मा और पदार्थ के अन्तर को बताने वाले सरल ज्ञान को अर्जित करना है। धार्मिक अनुष्ठानों का चरम उद्देश्य अपने आपको भौतिक बन्धन से छुड़ाना और उस दिव्य जगत में स्वतन्त्रता का जीवन पुन: प्राप्त करना है, जहाँ भगवान् ही प्रधान रहते हैं। अतएव धार्मिक नियमों का संचालन स्वयं भगवान् द्वारा होता है तथा धर्म का उद्देश्य महाजनों अर्थात् भगवान् के अधिकृत प्रतिनिधियों के अतिरिक्त और कोई नहीं जानता। भगवान् के ऐसे बारह महाजन हैं, जो धर्म के उद्देश्य को जानते हैं और वे सभी भगवान् की दिव्य सेवा में लगे रहते हैं। जो लोग अपना हित चाहते हैं, उन्हें चाहिए कि इन महाजनों का अनुसरण करें और उससे परम लाभ प्राप्त करें।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥