श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 2: दिव्यता तथा दिव्य सेवा  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक
वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखा: ।
वासुदेवपरा योगा वासुदेवपरा: क्रिया: ॥ २८ ॥
वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तप: ।
वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरा गति: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
वासुदेव—भगवान्; परा:—परम लक्ष्य; वेदा:—प्रामाणिक शास्त्र; वासुदेव—भगवान्; परा:—पूजा करने के लिए; मखा:—यज्ञ; वासुदेव—भगवान्; परा:—प्राप्त करने के साधन; योगा:—यौगिक साज-सामग्री; वासुदेव—भगवान् के; परा:—उनके अधीन; क्रिया:—सकाम कर्म; वासुदेव—भगवान्; परम्—परम; ज्ञानम्—ज्ञान; वासुदेव—भगवान्; परम्—सर्वश्रेष्ठ; तप:—तपस्या; वासुदेव—भगवान्; पर:—सर्वोच्च गुण; धर्म:—धर्म; वासुदेव—भगवान्; परा:— चरम; गति:—जीवन का लक्ष्य ।.
 
अनुवाद
 
 प्रामाणिक शास्त्रों में ज्ञान का परम उद्देश्य पूर्ण पुरुषोत्तम परमेश्वर श्रीकृष्ण हैं। यज्ञ करने का उद्देश्य उन्हें ही प्रसन्न करना है। योग उन्हीं के साक्षात्कार के लिए है। सारे सकाम कर्म अन्तत: उन्हीं के द्वारा पुरस्कृत होते हैं। वे परम ज्ञान हैं और सारी कठिन तपस्याएँ उन्हीं को जानने के लिए की जाती हैं। उनकी प्रेमपूर्ण सेवा करना ही धर्म है। वे ही जीवन के चरम लक्ष्य हैं।
 
तात्पर्य
 इन दो श्लोकों में पुष्टि हुई है कि एकमात्र भगवान् श्रीकृष्ण ही पूजा के पात्र हैं। वैदिक साहित्य का लक्ष्य भी यही है कि भगवान् के साथ सम्बन्ध स्थापित किया जाय और हमारी भूली हुई प्रेममयी सेवा को पुनरुज्जीवित किया जाय। यही वेदों का सार-तत्व है। इसी सिद्धान्त की पुष्टि भगवान् द्वारा भगवद्गीता में अपने ही शब्दों में इस प्रकार की गई है : वेदों का चरम उद्देश्य केवल उन्हें जानना है। सारे प्रामाणिक शास्त्र भगवान् द्वारा, श्रील व्यासदेव के शरीर के रूप में अवतरित होकर भौतिक प्रकृति से बद्ध पतितात्माओं को भगवान् श्रीकृष्ण का स्मरण कराने के लिए निर्मित किये गये हैं। कोई भी देवता भौतिक बन्धन से मुक्ति नहीं दिला सकता। यही समस्त वैदिक ग्रन्थों का निर्णय है। निर्विशेषवादी, जिन्हें भगवान् के व्यक्तित्व का ज्ञान नहीं होता, भगवान् की सर्वशक्तिमत्ता को कम बताते हैं, क्योंकि वे उन्हें भी अन्य समस्त साधारण जीवों के समान बताते हैं। इसी कारण से निर्विशेषवादियों को बड़ी ही कठिनाई से भौतिक बन्धन से मुक्ति मिल पाती है। वे अनेक जन्मों तक दिव्य ज्ञान का अनुशीलन करने के बाद ही उनकी शरण में जा पाते हैं।

कोई यह तर्क कर सकता है कि वैदिक कर्म याज्ञिक अनुष्ठानों पर टिके हैं। यह सच है। किन्तु ऐसे सारे यज्ञ वासुदेव की वास्तविक अनुभूति के लिए भी होते हैं। वासुदेव का अन्य नाम यज्ञ है और भगवद्गीता में यह स्पष्ट कहा गया है कि सारे यज्ञ तथा कर्म, यज्ञ या भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने के लिए ही किये जाने चाहिए। यही बात योग-पद्धति पर भी लागू होती है। योग का अर्थ है परमेश्वर से सम्पर्क स्थापित करना। किन्तु, इस विधि में आसन, ध्यान, प्राणायाम जैसी शारीरिक क्रियाएँ सम्मिलित रहती हैं और ये सब परमात्मास्वरूप अन्तर्यामी वासुदेव पर ध्यान केन्द्रित करने के निमित्त होती हैं। परमात्मा-साक्षात्कार तो वासुदेव का आंशिक साक्षात्कार है और यदि कोई इस प्रयास में सफल होता है, तो उसे वासुदेव का पूर्ण साक्षात्कार होता है। किन्तु अधिकांश योगी दुर्भाग्यवश शारीरिक विधि से प्राप्त यौगिक शक्तियों के द्वारा विपथ हो जाते हैं। ऐसे दुर्भाग्यशाली योगियों को अगले जन्म में विद्वान ब्राह्मणों या सम्पन्न वैश्यों के कुल में जन्म दिया जाता है, जिससे वे वासुदेव-साक्षात्कार के अधूरे कार्य को पूरा कर सकें। यदि ऐसे भाग्यवान ब्राह्मण तथा वैश्य-पुत्र अवसर का लाभ उठाते हैं, तो साधु पुरुषों की संगति से उन्हें सरलता से वासुदेव-साक्षात्कार हो जाता है। दुर्भाग्यवश ऐसे भाग्यशाली लोग भौतिक सम्पत्ति तथा सम्मान से पुन: वशीभूत हो जाते हैं और अपने जीवन-लक्ष्य को व्यवहारत: भूल जाते हैं।

ज्ञान के अनुशीलन में भी यही बात लागू होती है। भगवद्गीता के अनुसार ज्ञान के अनुशीलन के लिए अठारह बातें हैं। ज्ञान के ऐसे अनुशीलन से मनुष्य क्रमश: अभिमानरहित, मदरहित, अहिंसक, सहिष्णु, सरल, गुरुभक्त तथा आत्मसंयमी बन जाता है। ज्ञान के अनुशीलन से वह घर बार से अनासक्त हो जाता है और जन्म, मृत्यु जरा तथा व्याधि के कष्टों से अवगत हो जाता है। ज्ञान का सारा अनुशीलन भगवान् वासुदेव की भक्तिमय सेवा में जाकर समाप्त होता है। अतएव वासुदेव ही ज्ञान की समस्त शाखाओं के अनुशीलन के चरम लक्ष्य हैं। ज्ञान का जो अनुशीलन वासुदेव के मिलन के दिव्य स्तर तक ऊपर उठा सके, वही वास्तविक ज्ञान है। भगवद्गीता में भौतिक ज्ञान की विविध शाखाओं को अज्ञान की संज्ञा देकर तिरस्कृत किया गया है। भौतिक ज्ञान का अन्तिम लक्ष्य इन्द्रियों की तृप्ति करना है, जिसका अर्थ हुआ भौतिक जीवन को दीर्घ बनाना और इस प्रकार तीनों तापों का जारी रहना। अत: इस भौतिक जगत में कष्टमय जीवन की दीर्घ बनाना ही अज्ञान है। किन्तु यदि यही भौतिक ज्ञान आध्यात्मिक ज्ञान की दिशा में अग्रसर होता है, तो वह कष्टमय भौतिक अस्तित्व का अन्त करने में सहायक हो जाता है और वासुदेव धरातल पर आध्यात्मिक-जीवन का शुभारम्भ होता है।

यही बात समस्त तपस्याओं को लागू होती है। तपस्या का अर्थ ही है किसी उच्चतर जीवन- उद्देश्य के लिए स्वेच्छा से शारीरिक कष्टों को सहना। रावण तथा हिरण्यकशिपु ने इन्द्रियतृप्ति को उद्देश्य बनाकर नाना प्रकार के दारुण शारीरिक कष्ट झेले थे। कभी-कभी आधुनिक राज-नेता भी अपना राजनीतिक काम साधने के लिए कठिन तपस्याएँ करते हैं। यह वास्तव में तपस्या नहीं है। मनुष्य को चाहिए कि वासुदेव को जानने के लिए स्वेच्छा से शारीरिक असुविधाएँ स्वीकार करें, क्योंकि वास्तविक तपस्या की यही विधि है। अन्यथा अन्य सारी तपस्याएँ रजोगुणी तथा तमोगुणी मानी जाती हैं। रजोगुण तथा तमोगुण से जीवन के कष्टों का अन्त नहीं हो सकता। केवल सत्त्वगुण ही जीवन के तीनों तापों को कम कर सकता है। भगवान् कृष्ण के माता-पिता के रूप में प्राख्यात वसुदेव तथा देवकी ने वासुदेव को पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या की थी। भगवान् कृष्ण समस्त जीवों के जनक हैं (भगवद्गीता १४.४) अतएव वे समस्त जीवों में आदि पुरुष हैं। वे ही समस्त भोक्ताओं में आदि भोक्ता हैं। अतएव कोई उन्हें उत्पन्न करने वाला पिता नहीं हो सकता, जैसाकि अज्ञानी लोग सोचते हैं। वसुदेव तथा देवकी की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् कृष्ण ने उनका पुत्र बनना स्वीकार किया। अतएव यदि कोई तपस्या करनी है, तो ज्ञान की पराकाष्ठा, वासुदेव, को लक्ष्य बनाकर ही की जानी चाहिए।

वासुदेव आदि भगवान् श्रीकृष्ण हैं। जैसाकि पहले कहा जा चुका है, आदि भगवान् असंख्य रूपों में अपना विस्तार करते हैं। रूपों का ऐसा विस्तार उनकी विविध शक्तियों द्वारा सम्भव हो पाता है। उनकी शक्तियाँ भी अनेकानेक हैं। गुणता में उनकी अन्तरंगा शक्तियाँ श्रेष्ठ होती हैं और बहिरंगा शक्तियाँ निकृष्ट होती हैं। भगवद्गीता (७.४-६) में इन्हें क्रमश: परा तथा अपरा प्रकृति कहा गया है। अतएव अन्तरंगा शक्तियों के द्वारा विविध रूपों में होने वाला उनका विस्तार श्रेष्ठ होता है और बहिरंगा शक्तियों द्वारा होने वाला विस्तार निकृष्ट होता है। जीवात्माएँ भी उन्हीं के विस्तार (अंश) हैं। जो जीवात्माएँ उनकी अन्तरंगा शक्ति के विस्तार से उद्भूत होते हैं, वे नित्य मुक्त होते हैं और जो भौतिक शक्तियों से उद्भूत होते हैं, वे नित्य बद्ध होते हैं। अतएव ज्ञान, तप, त्याग तथा कर्म का सारा अनुशीलन हम पर पडऩे वाले प्रभावों को बदलने के लिए किया जाना चाहिए। इस समय हम सभी भगवान् की बहिरंगा शक्ति द्वारा नियन्त्रित हो रहे हैं, अतएव इसके प्रभाव (फल) को बदलने के लिए हमें आध्यात्मिक शक्ति का अनुशीलन करना चाहिए।

भगवद्गीता में कहा गया है कि जो महात्मा हैं या जिनके हृदय इतने विशाल हो चुके हैं कि वे भगवान् कृष्ण की सेवा में लगे रहते हैं, वे अन्तरंगा शक्ति के वश में रहते हैं और इसका फल यह होता है कि ऐसे विशाल हृदय वाले लोग बिना विचलित हुए भगवान् की सेवा में लगे ही रहते हैं। यही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए और यही समस्त वैदिक साहित्य का निर्णय है। किसी को सकाम कर्म या दिव्य ज्ञान के विषय में शुष्क चिन्तन करने की जरूरत नहीं है। सभी को चाहिए कि तुरन्त भगवान् की दिव्य प्रेममय सेवा में लग जाँए। मनुष्य को न तो उन विभिन्न देवताओं की पूजा करनी चाहिए, जो सृष्टि की उत्पत्ति, पालन तथा संहार का कार्य करने वाले भगवान् के हाथ की भाँति हैं। ऐसे अंसख्य शक्तिशाली देवता हैं, जो भौतिक जगत की बाह्य व्यवस्था की देख- रेख करते हैं। वे सब भगवान् वासुदेव के सहायकों के समान हैं। यहाँ तक कि ब्रह्माजी तथा शिवजी की गणना भी देवताओं में होती है, किन्तु भगवान् विष्णु या वासुदेव तो सदा दिव्य पद पर रहते हैं। यद्यपि वे भौतिक जगत के सतोगुण को स्वीकार करते हैं, किन्तु फिर भी वे समस्त भौतिक गुणों से परे रहते हैं। निम्नलिखित उदाहरण से यह बात और स्पष्ट हो जायेगी। एक बन्दीगृह में बन्दी होते हैं और बन्दीगृह के व्यवस्थापक भी होते हैं। किन्तु बन्दी तथा व्यवस्थापक दोनों राजा के नियमों से बँधे होते हैं। लेकिन यदि कभी-कभार राजा बन्दीगृह में आता है, तो वह बन्दीगृह के नियमों से बँधा नहीं होता। राजा सदैव बन्दीगृह के नियमों से परे होता है, ठीक उसी तरह जिस तरह भगवान् इस भौतिक जगत के नियमों से परे होते हैं।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥