श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 2: दिव्यता तथा दिव्य सेवा  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक
यथा ह्यवहितो वह्निर्दारुष्वेक: स्वयोनिषु ।
नानेव भाति विश्वात्मा भूतेषु च तथा पुमान् ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस तरह; हि—उसी तरह; अवहित:—से युक्त; वह्नि:—अग्नि; दारुषु—काष्ठ में; एक:—एक; स्व-योनिषु— अपनी योनियों में; नाना इव—अनेक जीवों की तरह; भाति—प्रकाशित होता है; विश्व-आत्मा—परमात्मा रूप भगवान्; भूतेषु—जीवों में; च—तथा; तथा—उसी तरह; पुमान्—परम पुरुष ।.
 
अनुवाद
 
 परमात्मा रूप में भगवान् सभी वस्तुओं में उसी तरह व्याप्त रहते हैं जिस तरह काष्ठ के भीतर अग्नि व्याप्त रहती है और इस प्रकार यद्यपि वे एक एवं अद्वितीय हैं, वे अनेक प्रकार से दिखते हैं।
 
तात्पर्य
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् वासुदेव अपने किसी एक पूर्णांश से सारे भौतिक जगत में विस्तार करते हैं और उनका अस्तित्व परमाणु ऊर्जा तक के भीतर देखा जा सकता है। पदार्थ, प्रतिपदार्थ, प्रोटान, न्यूट्रान आदि भगवान् के परमात्मा रूप के विभिन्न परिणाम हैं। जिस प्रकार काष्ठ से अग्नि प्रकट होती है या दूध से मक्खन निकलता है, उसी प्रकार परमात्मा रूप में भगवान् की उपस्थिति उन दिव्य विषयों के वैध श्रवण तथा कीर्तन की सम्मत विधि द्वारा अनुभव की जा सकती है, जिनका वर्णन उपनिषदों तथा वेदान्त जैसे वैदिक साहित्य में विशेष रूप से हुआ है। श्रीमद्भागवत ऐसे वैदिक साहित्य की प्रामाणिक व्याख्या है। भगवान् की अनुभूति दिव्य सन्देश के श्रवण द्वारा की जा सकती है और दिव्य विषय को अनुभव करने का एकमात्र यही तरीका है। जिस प्रकार किसी अन्य अग्नि द्वारा जलाने पर काष्ठ से अग्नि प्रकट होती है उसी प्रकार मनुष्य की दैवी चेतना अन्य दैवी अनुकम्पा से ही प्रकाशित की जा सकती है। श्री श्रीमद् पूज्य गुरु काष्ठ रूप जीवात्मा में विनम्रता से श्रवण करने वाले कर्णों द्वारा समुचित दिव्य सन्देश प्रविष्ट कराकर आध्यात्मिक अग्नि प्रज्ज्वलित करा सकते हैं। अतएव विनम्रता से सुनने की इच्छा के साथ ही समुचित गुरु के पास जाना चाहिए। इस प्रकार धीरे-धीरे दैवी अस्तित्व की अनुभूति हो जाती है। पशुता तथा मानवता का भेद इसी विधि पर आधारित है। मनुष्य ठीक से सुन सकता है, जबकि पशु ऐसा नहीं कर सकता।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥