श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 2: दिव्यता तथा दिव्य सेवा  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक
असौ गुणमयैर्भावैर्भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मभि: ।
स्वनिर्मितेषु निर्विष्टो भुङ्क्ते भूतेषु तद्गुणान् ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
असौ—वे परमात्मा; गुण-मयै:—प्रकृति के गुणों से प्रभावित; भावै:—स्वाभाविक रूप से; भूत—उत्पन्न; सूक्ष्म—सूक्ष्म; इन्द्रिय—इन्द्रियाँ; आत्मभि:—जीवों द्वारा; स्व-निर्मितेषु—अपनी ही सृष्टि में; निर्विष्ट:—प्रवेश करके; भुङ्क्ते—भोग के लिए प्रेरित करते हैं; भूतेषु—जीवों में; तत्-गुणान्—प्रकृति के वे गुण ।.
 
अनुवाद
 
 भौतिक जगत के तीन गुणों से प्रभावित हुए जीवों के देह में परमात्मा प्रविष्ट होते हैं और सूक्ष्म मन के द्वारा तीन गुणों के फल भोगने के लिए जीवों को प्रेरित करते हैं।
 
तात्पर्य
 सर्वाधिक बुद्धिमान जीव ब्रह्मा से लेकर नगण्य चींटी तक जीवों की ८४,००,००० लाख योनियाँ हैं और ये सब की सब अपने सूक्ष्म मन तथा स्थूल शरीर की इच्छाओं के अनुसार भौतिक संसार का भोग करती हैं। स्थूल भौतिक शरीर सूक्ष्म मन की अवस्थाओं पर आधारित होता है और इन्द्रियाँ जीव की इच्छानुसार उत्पन्न की जाती हैं। भगवान्, परमात्मा रूप में, जीव को भौतिक सुख प्राप्त करने में सहायक बनते हैं, क्योंकि जीव अपनी इच्छा के अनुसार कोई भी भौतिक सुख प्राप्त करने में पूर्ण रूप से अक्षम है। वह इच्छा करने वाला है और भगवान् उसका नियमन करने वाले हैं। आशय यह है कि सारे जीव भगवान् के अंश हैं, अतएव वे भगवान् से अभिन्न हैं। भगवद्गीता में भगवान् ने विविध शरीरधारी जीवों को अपना पुत्र कहा है। पुत्रों के सुख एवं दुख परोक्ष रूप से पिता के भी सुख एवं दुख होते हैं; तो भी पुत्रों के सुख-दुख से पिता प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित नहीं होते। वे इतने दयालु हैं कि वे जीव के साथ परमात्मा रूप में निरन्तर बने रहते हैं और जीव को वास्तविक सुख की ओर प्रेरित करते रहते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥