श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 2: दिव्यता तथा दिव्य सेवा  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
नारायणम्—भगवान् को; नम:-कृत्य—नमस्कार करके; नरम् च एव—तथा नारायण ऋषि को; नर-उत्तमम्—सर्वश्रेष्ठ मनुष्य; देवीम्—देवी; सरस्वतीम्—विद्या की अधिष्ठात्री को; व्यासम्—व्यासदेव को; तत:—तत्पश्चात्; जयम्—विजय प्राप्त करने के लिए; उदीरयेत्—घोषित करे ।.
 
अनुवाद
 
 विजय के साधनस्वरूप इस श्रीमद्भागवत का पाठ करने (सुनने) के पूर्व मनुष्य को चाहिए कि वह श्रीभगवान् नारायण को, नरोत्तम नरनारायण ऋषि को, विद्या की देवी माता सरस्वती को तथा ग्रंथकार श्रील व्यासदेव को नमस्कार करे।
 
तात्पर्य
 सारा वैदिक साहित्य तथा सारे पुराण इस भौतिक जगत के गहनतम भागों पर विजय प्राप्त करने के लिए हैं। जीव अनादि काल से भौतिक इन्द्रियतृप्ति के प्रति आसक्त होने के कारण ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को भूल चुका है। इस भौतिक जगत में उसका जीवन-संघर्ष अविरत चलने वाला है और इस के लिए कोई योजना बनाकर जीव का इसमें से निकल पाना सम्भव नहीं है। यदि वह इस अविरत जीवन-संघर्ष पर विजय पाना चाहता है, तो उसे ईश्वर के साथ अपने नित्य सम्बन्ध को पुन:स्थापित करना होगा। जो भी इस प्रकार के निवारक उपाय अपनाना चाहता है, उसे वेदों तथा पुराणों जैसे साहित्य का आश्रय लेना होगा। मूर्ख लोगों का कहना है कि पुराणों का वेदों से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं है। किन्तु ये पुराण विभिन्न प्रकार के लोगों के लिए वेदों की पूरक व्याख्याएँ हैं। सभी मनुष्य एक से नहीं होते। कुछ लोग सतोगुणी होते हैं, कुछ रजोगुणी होते हैं और कुछ तमोगुणी होते हैं। पुराणों को इस प्रकार से विभक्त किया गया है कि किसी भी श्रेणी के लोग उनसे लाभ उठा सकते हैं और धीरे-धीरे अपनी खोई हुई स्थिति को पुन: प्राप्त करके कठोर जीवन-संघर्ष से बाहर निकल सकते हैं। श्रील सूत गोस्वामी पुराणों के पाठ की विधि प्रदर्शित करते हैं। जो लोग वैदिक साहित्य तथा पुराणों के उपदेशक बनना चाहते हैं, वे इस विधि का पालन कर सकते हैं। श्रीमद्भागवत निष्कलंक पुराण है और यह विशेषकर उनके लिए है, जो स्थायी रूप से भव-बन्धन से छूटने के इच्छुक हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥