श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 2: दिव्यता तथा दिव्य सेवा  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
धर्म: स्वनुष्ठित: पुंसां विष्वक्सेनकथासु य: ।
नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
धर्म:—वृत्ति; स्वनुष्ठित:—अपने पद के अनुसार सम्पन्न; पुंसाम्—मनुष्यों का; विष्वक्सेन—भगवान् (पूर्ण अंश) की; कथासु—कथा में; य:—जो है; न—नहीं; उत्पादयेत्—उत्पन्न करता है; यदि—यदि; रतिम्—आसक्ति; श्रम:—व्यर्थ श्रम; एव—निरा; हि—निश्चय ही; केवलम्—पूर्ण रूप से ।.
 
अनुवाद
 
 मनुष्य द्वारा अपने पद के अनुसार सम्पन्न की गई वृत्तियाँ यदि भगवान् के सन्देश के प्रति आकर्षण उत्पन्न न कर सकें, तो वे निरी व्यर्थ का श्रम होती हैं।
 
तात्पर्य
 मनुष्य की जीवन के प्रति विभिन्न अवधारणाओं के अनुसार वृत्तियाँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। निपट भौतिकतावादी के लिए, जो स्थूल शरीर से परे कुछ भी नहीं देख पाता, इन्द्रियों से परे कुछ भी नहीं है। अतएव उसकी वृत्तियाँ संकेन्द्रित और विस्तारित स्वार्थ तक ही सीमित रहती हैं। यह संकेन्द्रित स्वार्थ अपने ही शरीर के चारों ओर केन्द्रित रहता है—सामान्य रूप से यह निम्न पशुओं में देखा जाता है। विस्तारित स्वार्थ मानव-समाज में दिखता है और यह परिवार, समाज, समुदाय, राष्ट्र तथा विश्व के दृष्टिकोण से शारीरिक सुख के इर्द-गिर्द घूमता है। इन निपट भौतिकतावादियों के ऊपर मनोधर्मी तर्कवादी होते हैं, जो मनोजगत में उड़ान भरते रहते हैं और उनकी वृत्तियों में कविता बनाना तथा दार्शनिकपन या शरीर तथा मन के वही सीमित स्वार्थ के उद्देश्य से कोई ‘वाद’ चलाना सम्मिलित होते हैं। किन्तु शरीर तथा मन के ऊपर सुप्त आत्मा है, जो यदि शरीर में न रहे तो सारे शारीरिक तथा मानसिक स्वार्थ व्यर्थ एवं शून्य हो जाँय। किन्तु कम बुद्धिमान लोगों को आत्मा की आवश्यकताओं की कोई जानकारी नहीं होती।

चूँकि मूर्ख लोगों को न तो आत्मा की कोई जानकारी होती है और न इसकी ही कि वह शरीर तथा मन के विचार-क्षेत्र से किस तरह परे है, फलस्वरूप वे अपनी-अपनी वृत्तियों से संतुष्ट नहीं रहते। यहाँ पर आत्म-संतुष्टि का प्रश्न उठाया गया है। आत्मा स्थूल शरीर तथा सूक्ष्म मन से परे है। वह शरीर तथा मन का एक सशक्त सक्रिय तत्त्व है। सुप्त आत्मा की आवश्यकता को जाने बिना केवल शरीर तथा मन को तुष्ट करके कोई सुखी नहीं रह सकता। शरीर तथा मन तो आत्मा के व्यर्थ के बाह्य आवरण मात्र हैं। आत्मा की आवश्यकताएँ पूरी होनी ही चाहिए। केवल पंछी के पिंजड़े की सफाई करके पंछी को प्रसन्न नहीं किया जा सकता। मनुष्य को इस पंछी की खुद की आवश्यकताएँ जाननी चाहिए।

आत्मा की आवश्यकता यह है कि वह भौतिक बन्धन के संकुचित क्षेत्र से बाहर निकलना चाहता है और पूर्ण स्वतन्त्रता की अपनी इच्छा को पूरा करना चाहता है। वह इस विशालतर ब्रह्माण्ड की आच्छादित दीवालों के बाहर जाना चाहता है। वह स्वतन्त्र प्रकाश तथा आत्मा का दर्शन करना चाहता है। उसे पूरी स्वतन्त्रता तब प्राप्त होती है, जब वह पूर्ण आत्मा, भगवान्, को मिलता है। प्रत्येक प्राणी में ईश्वर के प्रति प्रसुप्त स्नेह रहता है; आध्यात्मिक जीवन का प्राकट्य स्थूल शरीर तथा मन के माध्यम से स्थूल तथा सूक्ष्म पदार्थ के प्रति विकृत प्रेम के रूप में होता है। अतएव हमें उन वृत्तियों (धर्म) में लगना होता है, जिनसे हमारी दैवी चेतना जगे। ऐसा परमेश्वर की दिव्य लीलाओं के श्रवण एवं कीर्तन द्वारा ही सम्भव है और ऐसी कोई भी वृत्ति जो मनुष्य को परमेश्वर के दिव्य सन्देश का श्रवण तथा कीर्तन करने में अनुरक्त नहीं करती है, यहाँ पर ऐसी वृत्ति को समय का अपव्यय बताया गया है। ऐसा इसलिए है कि अन्य वृत्तियाँ (चाहे वे किसी भी ‘वाद’ के रूप में हों) आत्मा को मुक्ति नहीं दिला सकतीं। यहाँ तक कि मोक्षकामियों के कर्म भी व्यर्थ माने जाते हैं, क्योंकि वे समस्त स्वतन्त्रताओं के मूल स्रोत को नहीं जान पाते। निपट भौतिकतावादी व्यावहारिक रूप से देख सकता है कि उसका भौतिक लाभ काल तथा स्थल से बँधा है, चाहे वह इस लोक में हो या अन्यत्र। यदि वह स्वर्गलोक में भी चला जाये, तो उसकी लालायित आत्मा को वहाँ भी स्थायी वास नहीं मिलेगा। इस लालायित आत्मा को पूर्ण भक्ति की पूर्ण वैज्ञानिक विधि द्वारा तुष्ट किया जाना चाहिए।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥