श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
तत: सप्तम आकूत्यां रुचेर्यज्ञोऽभ्यजायत ।
स यामाद्यै: सुरगणैरपात्स्वायम्भुवान्तरम् ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; सप्तमे—सातवाँ; आकूत्याम्—आकूति के गर्भ से; रुचे:—प्रजापति रुचि के द्वारा; यज्ञ:—यज्ञ रूप में भगवान् का अवतार; अभ्यजायत—अवतरित हुए; स:—वे; याम-आद्यै:—यम इत्यादि से; सुर-गणै:—देवताओं के द्वारा; अपात्—शासन किया; स्वायम्भुव-अन्तरम्—स्वाम्भुव मनु का काल परिर्वतन (मन्वन्तर) ।.
 
अनुवाद
 
 सातवें अवतार प्रजापति रुचि तथा उनकी पत्नी आकूति के पुत्र यज्ञ थे। उन्होंने स्वायम्भुव मनु के बदलने पर शासन सँभाला और अपने पुत्र यम जैसे देवताओं की सहायता प्राप्त की।
 
तात्पर्य
 भौतिक जगत की विधि-व्यवस्था बनाये रखने के लिए, देवताओं द्वारा ग्रहण किये जाने वाले प्रशासकीय पद, अत्यन्त उन्नत पुण्यशाली जीवों को प्रदान किये जाते हैं। जब ऐसे पुण्यात्माओं का अभाव होता है, तो भगवान् स्वयं ब्रह्मा, प्रजापति, इन्द्र आदि के रूप में अवतरित होकर शासन भार सँभालते हैं। स्वायंभुव मनु (आधुनिक युग वैवस्वत मनु का है) के काल में कोई ऐसा उपयुक्त जीव न था, जो इन्द्रलोक के राजा इन्द्र का पद ग्रहण कर सके। उस समय भगवान् स्वयं इन्द्र बन गये। यम आदि अपने पुत्रों तथा देवताओं की सहायता से भगवान् यज्ञ ने संसार का शासन सँभाला।
 
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