श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.3.15 
रूपं स जगृहे मात्स्यं चाक्षुषोदधिसम्प्लवे ।
नाव्यारोप्य महीमय्यामपाद्वैवस्वतं मनुम् ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
रूपम्—रूप; स:—उसने; जगृहे—स्वीकार किया; मात्स्यम्—मछली का; चाक्षुष—चाक्षुष; उदधि—जल; सम्प्लवे— बाढ़, प्रलय; नावि—नाव में; आरोप्य—रख कर; मही—पृथ्वी; मय्याम्—डूबा हुआ; अपात्—रक्षा की; वैवस्वतम्— वैवस्वत; मनुम्—मनुष्य के पिता, मनु को ।.
 
अनुवाद
 
 जब चाक्षुष मनु के युग के बाद पूर्ण जलप्रलय हुआ और सारा जगत जल में डूब गया था, तब भगवान् मछली (मत्स्य) के रूप में प्रकट हुए और वैवस्वत मनु को नाव में रखकर उनकी रक्षा की।
 
तात्पर्य
 भागवत के मूल भाष्यकार श्रीपाद श्रीधर स्वामी के मतानुसार प्रत्येक मनु के बदलने पर सदैव प्रलय नहीं होता। फिर भी चाक्षुष मनु के कार्यकाल के पश्चात् यह प्रलय सत्यव्रत को अद्भुत लीला दिखाने के उद्देश्य से किया गया। लेकिन श्रील जीव गोस्वामी ने प्रामाणिक शास्त्रों (विष्णु धर्मोत्तर, मार्कण्डेय पुराण, हरिवंश आदि) से निश्चित प्रमाण प्रस्तुत किये हैं कि प्रत्येक मनु के बाद प्रलय होता ही है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने भी श्रील जीव गोस्वामी का अनुमोदन किया है और भागवतामृत से प्रत्येक मनु के पश्चात् ऐसे जल प्लावन के उद्धरण दिये हैं। इसके अतिरिक्त, भगवान् अपने भक्त सत्यव्रत पर विशेष अनुग्रह प्रदर्शित करने के लिए इसी विशेष युग में स्वयं अवतरित हुए।
 
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