श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
जन्म गुह्यं भगवतो य एतत्प्रयतो नर: ।
सायं प्रातर्गृणन् भक्त्या दु:खग्रामाद्विमुच्यते ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
जन्म—जन्म; गुह्यम्—गुप्त; भगवत:—भगवान् का; य:—जो; एतत्—वे सब; प्रयत:—सावधानी से; नर:—मनुष्य; सायम्—शाम को; प्रात:—प्रात:काल; गृणन्—पाठ करता, बाँचता है; भक्त्या—भक्तिपूर्वक; दु:ख-ग्रामात्—समस्त कष्टों से; विमुच्यते—छूट जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 जो कोई भी भगवान् के गुह्य अवतारों का सावधानीपूर्वक प्रतिदिन सुबह तथा शाम को पाठ करता है, वह जीवन के समस्त दुखों से छूट जाता है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में भगवान् ने घोषणा की है कि जो कोई उनके दिव्य जन्म तथा कर्म के तत्त्वों को जानता है, वह इस अस्थायी भौतिक संसार से छूट कर भगवद्धाम को जाता है। अतएव इस भौतिक जगत में भगवान् के अवतार की गुह्यता को भलीभाँति जान लेने पर भौतिक बन्धन से छुटकारा प्राप्त हो जाता है। अत: भगवान् का जन्म तथा उनके कर्म, जिन्हें वे जनसामान्य के कल्याण हेतु प्रकट करते हैं, सामान्य नहीं होते। वे गुह्य हैं और जो भक्ति-पूर्वक इस विषय की गम्भीरता को जानना चाहते हैं, उन्हें ही यह रहस्य प्रकट हो पाता है। इस तरह उन्हें भवबन्धन से विमुक्ति प्राप्त हो जाती है। अत: यह सलाह दी गई है कि जो कोई भागवत के इस अध्याय का, जिसमें भगवान् के विभिन्न अवतारों का वर्णन है, भक्ति तथा श्रद्धापूर्वक केवल पाठ करता है उसे भगवान् के जन्मों तथा कर्मों का अन्तर्दर्शन प्राप्त हो जाता है। विमुक्ति शब्द इस बात का सूचक है कि भगवान् का जन्म तथा उनके कर्म दिव्य हैं; अन्यथा मात्र उनका पाठ करने से किसी को मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। अतएव ये गुह्य हैं और जो भक्ति के निर्धारित विधि विधानों का पालन नहीं करते, वे भगवान् के जन्म तथा कर्म के रहस्यों को जान पाने का अधिकार नहीं रखते।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥