श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
यस्यावयवसंस्थानै: कल्पितो लोकविस्तर: ।
तद्वै भगवतो रूपं विशुद्धं सत्त्वमूर्जितम् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
यस्य—जिसका; अवयव—शारीरिक विस्तार; संस्थानै:—में स्थित; कल्पित:—कल्पित किया गया; लोक—निवासियों के ग्रह; विस्तर:—विभिन्न; तत् वै—लेकिन वह है; भगवत:—भगवान् का; रूपम्—रूप; विशुद्धम्—शुद्ध; सत्त्वम्— अस्तित्व; ऊर्जितम्—सर्वश्रेष्ठ ।.
 
अनुवाद
 
 ऐसा विश्वास किया जाता है कि समस्त ब्रह्माण्ड के ग्रहमंडल पुरुष के विराट शरीर में स्थित हैं, किन्तु उन्हें सर्जित भौतिक अवयवों से कोई सरोकार नहीं होता। उनका शरीर नित्य आध्यात्मिक अस्तित्वमय है जिसकी कोई तुलना नहीं है।
 
तात्पर्य
 परम सत्य के विराट्-रूप या विश्व-रूप की धारणा विशेष रूप से नवदीक्षितों के लिए है, जो भगवान् के दिव्य रूप के विषय में सोच सकने में अक्षम होते हैं। उनके लिए रूप का अर्थ इस भौतिक जगत से सम्बद्ध कोई वस्तु है, अतएव प्रारम्भ में भगवान् की शक्ति के विस्तार पर ध्यान एकाग्र करने के लिए ब्रह्म की विरोधी कल्पना आवश्यक होती है। जैसाकि ऊपर कहा जा चुका है, भगवान् महत्-तत्त्व के रूप में अपनी शक्ति का विस्तार करते हैं, जिसमें सभी भौतिक अवयव सम्मिलित रहते हैं। एक तरह से भगवान् की शक्ति का विस्तार तथा स्वयं भगवान् एक हैं, किन्तु साथ ही साथ महत्-तत्त्व भगवान् से भिन्न भी है। फलस्वरूप, भगवान् की शक्ति तथा भगवान् एक ही साथ भिन्न तथा अभिन्न हैं। इस तरह विराट-रूप की अवधारणा, विशेष रूप से निर्विशेषवादियों के लिए, भगवान् के नित्य रूप से अभिन्न है। भगवान् का यह नित्य रूप महत्-तत्त्व की सृष्टि के पहले से विद्यमान रहता है और यहाँ पर इस बात पर बल दिया गया है कि भगवान् का नित्य रूप प्रकृति के गुणों से परम आध्यात्मिक या दिव्य है। यही दिव्य रूप भगवान् की अन्तरंगा शक्ति से प्रकट होता है और अनेक अवतारों के रूप में उनका स्वरूप वैसे ही दिव्य गुण वाला बना रहता है, उसमें महत्-तत्त्व का किंचित स्पर्श तक नहीं होता।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥