श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक
एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मन: ।
मायागुणैर्विरचितं महदादिभिरात्मनि ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
एतत्—ये सब; रूपम्—रूप; भगवत:—भगवान् के; हि—निश्चय ही; अरूपस्य—जिनका कोई भौतिक रूप नहीं है उनका; चित्-आत्मन:—ब्रह्म के; माया—भौतिक शक्ति, माया; गुणै:—गुणों से; विरचितम्—निर्मित; महत्- आदिभि:—पदार्थ के अवयवों से; आत्मनि—आत्मा में ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् के विराट रूप की धारणा, जिसमें वे इस भौतिक जगत में प्रकट होते हैं, काल्पनिक है। यह तो अल्पज्ञों (तथा नवदीक्षितों) को भगवान् के रूप की धारणा में प्रवेश कराने के लिए है। लेकिन वस्तुत: भगवान् का कोई भौतिक रूप नहीं होता।
 
तात्पर्य
 भगवान् के नाना अवतारों के साथ-साथ उनके विश्व-रूप या विराट-रूप की धारणा का उल्लेख नहीं किया गया है, क्योंकि ऊपर बताये गये भगवान् के सारे अवतार दिव्य हैं और उनके शरीरों में भौतिकता का रंचमात्र भी स्पर्श नहीं है। उनके शरीर तथा आत्मा में कोई अन्तर नहीं होता, जैसाकि बद्धजीव में होता है। विराट रूप की कल्पना तो केवल नवदीक्षित पूजकों के लिए है। उन्हीं के लिए भौतिक विराट-रूप प्रस्तुत किया जाता है, जिसकी व्याख्या द्वितीय स्कंध में की जायेगी। विराट-रूप में विभिन्न लोकों के भौतिक रूप को उनके पाँव, हाथ आदि के रूप में कल्पित किया गया है। वस्तुत: ऐसे सब वर्णन नवदीक्षितों के लिए होते हैं। वे पदार्थ से आगे कुछ भी नहीं सोच पाते। भगवान् के भौतिक बोध की गणना उनके वास्तविक रूपों की सूची में नहीं की जाती। परमात्मा रूप में भगवान् प्रत्येक भौतिक रूप के भीतर रहते हैं, यहाँ तक कि परमाणुओं के भी भीतर रहते हैं, लेकिन बाह्य भौतिक रूप तो भगवान् एवं जीव दोनों के लिए कल्पनामात्र है। बद्धजीवों के वर्तमान स्वरूप भी वास्तविक नहीं हैं। निष्कर्ष यह है कि भगवान् के विराट-रूप की धारणा काल्पनिक है। भगवान् तथा जीव दोनों ही जीवंत आत्मा हैं और उनका मूल शरीर आध्यात्मिक (चिन्मय) है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥