श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक
यथा नभसि मेघौघो रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले ।
एवं द्रष्टरि द‍ृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभि: ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस प्रकार; नभसि—आकाश में; मेघ-ओघ:—बादलों का समूह; रेणु:—धूल; वा—तथा; पार्थिव:— मलिनता, धुंधलका; अनिले—वायु में; एवम्—इस प्रकार; द्रष्टरि—देखने वाले को; दृश्यत्वम्—देखने के लिए; आरोपितम्—आरोपित होता है; अबुद्धिभि:—अल्पज्ञों द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 बादल तथा धूल वायु द्वारा ले जाए जाते हैं, लेकिन अल्पज्ञ लोग कहते हैं कि आकाश मेघाच्छादित है और वायु धूलिमय (मलिन) है। इसी प्रकार वे लोग आत्मा के विषय में भी भौतिक शरीर की धारणाओं का आरोपण करते हैं।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर आगे और पुष्टि की गई है कि हम उन भगवान् को अपने भौतिक नेत्रों तथा इन्द्रियों से नहीं देख सकते, जो पूर्ण रूप से आत्मा हैं। यहाँ तक कि हम जीवों के भौतिक शरीर में विद्यमान आध्यात्मिक स्फुलिंग तक की पहचान नहीं कर पाते। हम शरीर के बाह्य आवरण या जीव के सूक्ष्म मन की तलाश तो करते हैं, लेकिन हम शरीर के भीतर का आध्यात्मिक स्फुलिंग नहीं देख पाते। अतएव हमें जीव के स्थूल शरीर की उपस्थिति के कारण जीव की उपस्थिति स्वीकारनी पड़ती है। इसी प्रकार, जो लोग भगवान् का दर्शन अपने वर्तमान भौतिक नेत्रों से या भौतिक इन्द्रियों से करना चाहते हैं, उन्हें विराट-रूप का ध्यान करने की सलाह दी जाती है। उदाहरणार्थ, जब कोई व्यक्ति अपनी कार में बैठ कर कहीं जाता है, जिसे आसानी से देखा जा सकता है, तो उस कार की पहचान उसमें बैठे व्यक्ति से की जाती है। जब राष्ट्रपति अपनी विशिष्ट कार में बैठ कर कहीं जाता है, तो हम कहते हैं, “वह रहा राष्ट्रपति।” उस समय, हम कार की पहचान राष्ट्रपति के साथ करते हैं। इसी प्रकार उन अल्पज्ञ व्यक्तियों को जो बिना जरूरी योग्यता के ईश्वर का तुरन्त दर्शन करना चाहते हैं, उन्हें ऐसा दिखाया जाता है कि विशालकाय भौतिक ब्रह्माण्ड भगवान् का रूप है, यद्यपि भगवान् भीतर तथा बाहर सर्वत्र हैं। इस प्रसंग में आकाश के बादल तथा आकाश की नीलिमा का उदाहरण लिया जा सकता है। यद्यपि आकाश की नीलिमा तथा आकाश भिन्न-भिन्न हैं, किन्तु हम आकाश के रंग को नीला समझते हैं। परंतु यह तो केवल अल्पज्ञ की सामान्य धारणा है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥