श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक
अत: परं यदव्यक्तमव्यूढगुणबृंहितम् ।
अद‍ृष्टाश्रुतवस्तुत्वात्स जीवो यत्पुनर्भव: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
अत:—यह; परम्—परे; यत्—जो; अव्यक्तम्—अप्रकट; अव्यूढ—बिना किसी प्रकार के रूप के; गुण-बृंहितम्—गुणों से प्रभावित; अदृष्ट—अदृश्य, अनदेखा; अश्रुत—अनसुना; वस्तुत्वात्—वैसा होने से; स:—वह; जीव:—जीव; यत्— जो; पुन:-भव:—बारम्बार जन्म ग्रहण करता है ।.
 
अनुवाद
 
 रूप की इस स्थूल अवधारणा से परे रूप की एक अन्य सूक्ष्म धारणा है, जिसका कोई आकार नहीं होता और जो अनदेखा, अनसुना तथा अव्यक्त होता है। जीव का रूप इस सूक्ष्मता से परे है, अन्यथा उसे बारम्बार जन्म न लेना पड़ता।
 
तात्पर्य
 जिस प्रकार इस स्थूल दृश्य जगत का विचार भगवान् के विराट शरीर के रूप में किया जाता है, उसी प्रकार उनके सूक्ष्म शरीर की भी धारणा है जिसे न तो देखा जा सकता है, न सुना या प्रकट किया जा सकता है। लेकिन वस्तुत: शरीर की ये समस्त स्थूल या सूक्ष्म अवधारणाएँ जीवों से सम्बन्धित होती हैं। जीव का अपना आध्यात्मिक रूप होता है, जो इस स्थूल भौतिक या सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक अस्तित्व से परे होता है। ज्योंही जीव इस दृश्य स्थूल शरीर को त्याग देता है, त्योंही स्थूल शरीर तथा मनोवैज्ञानिक क्रियाएं करना बंद कर देती है। वस्तुत: हम कहते हैं कि जीव चला गया, क्योंकि वह न तो दिखता है, न ही सुनाई देता है। यहाँ तक कि जब जीव प्रगाढ़ निद्रा में होता है, तब स्थूल शरीर कार्य नहीं करता होता, तो हम यह जानते हैं कि श्वास लेने के कारण वह शरीर के भीतर है। अतएव जीव के देह से चले जाने (मरने) का यह अर्थ कदापि नहीं होता कि जीवात्मा का अस्तित्व ही नहीं है। वह यहीं होता है, अन्यथा पुन: पुन: जन्म क्यों होता? निष्कर्ष यह निकला कि भगवान् अपने दिव्य रूप में नित्य विद्यमान रहते हैं, जो जीव के समान न तो स्थूल है, न सूक्ष्म हैं। उनके शरीर की तुलना कभी भी जीव के स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरों से नहीं की जा सकती। ईश्वर के शरीर की ऐसी सारी भवधारणाएँ काल्पनिक हैं। जीव का अपना सनातन आध्यात्मिक रूप होता है, जो उसके भौतिक कल्मष के कारण ही बद्ध रहता है।
 
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