श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक
यत्रेमे सदसद्रूपे प्रतिषिद्धे स्वसंविदा ।
अविद्ययात्मनि कृते इति तद्ब्रह्मदर्शनम् ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
यत्र—जब भी; इमे—इन सबमें; सत्-असत्—स्थूल तथा सूक्ष्म; रूपे—के रूपों में; प्रतिषिद्धे—दूर हो जाने पर; स्व संविदा—आत्म-साक्षात्कार द्वारा; अविद्यया—अज्ञान से; आत्मनि—आत्मा में; कृते—आरोपित; इति—इस प्रकार; तत्—वह है; ब्रह्म-दर्शनम्—परमेश्वर के दर्शन की विधि ।.
 
अनुवाद
 
 जब कभी मनुष्य आत्म-साक्षात्कार द्वारा यह अनुभव करता है कि स्थूल तथा सूक्ष्म दोनों शरीरों का शुद्ध आत्मा से कोई सरोकार नहीं, उस समय वह अपना तथा साथ ही साथ भगवान् का दर्शन करता है।
 
तात्पर्य
 आत्म-साक्षात्कार तथा मोह में यही अन्तर है कि स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरों के रूप में भौतिक शक्ति का क्षणिक या भ्रामक आरोपण आत्मा के बाह्य आवरण हैं। ये आवरण अविद्या से जनित हैं। ऐसे आवरण भगवान् के व्यक्तित्व पर कभी प्रभावशाली नहीं होते। इसको भलीभाँति जान लेना ही मुक्ति या परमेश्वर का दर्शन है। इसका अर्थ यह होता है कि ईश-सदृश अर्थात् आध्यात्मिक जीवन अपनाने से पूर्ण आत्म-साक्षात्कार सम्भव हो पाता है। आत्म- साक्षात्कार का अर्थ है, स्थूल तथा सूक्ष्म शरीर की आवश्यकताओं के प्रति अन्यमनस्क होना और आत्मा के कार्यों के प्रति गम्भीर बनना। कार्यों के लिए प्रेरणा आत्मा से उत्पन्न होती है, किन्तु आत्मा की वास्तविक स्थिति न जानने के कारण ऐसे कार्य भ्रामक बन जाते हैं। अविद्या के कारण अपने हित की गणना स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरों को ध्यान में रखकर की जाती है, फलस्वरूप सारे कार्य जन्म-जन्मान्तर के कार्यों का सारा ढाँचा ही बिगड़ जाता है। किन्तु जब कोई मनुष्य समुचित अनुशीलन द्वारा आत्मा से भेंट करता है, तब आत्मा के कार्यों का शुभारम्भ होता है। फलस्वरूप, जो व्यक्ति आत्मा के कार्यों में व्यस्त रहता है, वह बद्ध जीवन में रहता हुआ भी ‘जीवन्मुक्त’ कहलाता है।

आत्म-साक्षात्कार की यह पूर्ण अवस्था किसी कृत्रिम साधन से नहीं, अपितु निरन्तर दिव्य स्थिति में रहने वाले भगवान् के चरणकमलों का आश्रय ग्रहण करने से प्राप्त की जाती है। भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि वे प्रत्येक जीव के हृदय में विद्यमान हैं और उन्हीं से सारा ज्ञान, स्मृति या विस्मृति होती है। जब जीव भौतिक शक्ति (मोह) का भोक्ता बनना चाहता है, तो भगवान् उसे विस्मृति के रहस्य से ढक देते हैं और इस प्रकार जीव स्थूल तथा सूक्ष्म शरीर को ही अपना स्व: मानने का भ्रम पाल लेता है। और जब दिव्य ज्ञान के अनुशीलन द्वारा जीव विस्मृति के पाश से छूटने के लिए भगवान् से प्रार्थना करता है, तो भगवान् अपनी अहैतुकी कृपा से जीव के मोहजनित आवरण को हटा देते हैं और वह स्व की अनुभूति करने लगता है। फिर वह बद्ध जीवन से छूटकर अपनी शाश्वत वैधानिक स्थिति में स्वयं को भगवान् की सेवा में लगा लेता है। यह सब भगवान् की बहिरंगा शक्ति के द्वारा या साक्षात् अन्तरंगा शक्ति के द्वारा सम्पन्न किया जाता है।

 
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