श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक
यद्येषोपरता देवी माया वैशारदी मति: ।
सम्पन्न एवेति विदुर्महिम्नि स्वे महीयते ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
यदि—यदि, फिर भी; एषा—वे; उपरता—दमित; देवी माया—माया; वैशारदी—ज्ञान से पूर्ण; मति:—प्रकाश; सम्पन्न:—सेवा परिपूर्ण; एव—निश्चय ही; इति—इस प्रकार; विदु:—जानते हुए; महिम्नि—महिमा में; स्वे—अपनी; महीयते—प्रतिष्ठित ।.
 
अनुवाद
 
 यदि माया का शमन हो जाता है और यदि भगवत्कृपा से जीव ज्ञान से सम्पन्न हो जाता है, तो उसे तुरन्त आत्म-साक्षात्कार का प्रकाश प्राप्त होता है और वह अपनी महिमा में प्रतिष्ठित (महिमामण्डित) हो जाता है।
 
तात्पर्य
 चूँकि भगवान् परम ब्रह्म हैं, अतएव उनके रूप, नाम, लीलाएँ, गुण, पार्षद तथा शक्तियाँ उनसे अभिन्न हैं। उनकी दिव्य शक्ति उनकी सर्वशक्तिमत्ता के अनुसार कार्य करती है। वही शक्ति उनकी अन्तरंगा, बहिरंगा तथा तटस्था शक्तियों के रूप में कार्य करती है और वे अपनी सर्वशक्तिमत्ता के कारण इन तीनों शक्तियों में से किसी के भी द्वारा कुछ भी कर सकते हैं। वे अपनी इच्छानुसार बहिरंगा शक्ति को अन्तरंगा शक्ति में बदल सकते हैं। इसीलिए भगवत्कृपा से वह बहिरंगा शक्ति जो इसके इच्छुक जीवों को मोहने के काम में प्रयुक्त की जाती है, भगवान् की इच्छा से बद्धजीव के पश्चात्ताप तथा तपस्या के अनुपात में शमित होती है। फिर यही शक्ति शुद्ध हुए जीव को आत्म-साक्षात्कार के पथ पर अग्रसर होने में सहायक बनती है। इस प्रसंग में विद्युतशक्ति का दृष्टान्त उपयुक्त होगा। निपुण विद्युत कर्मी एक ही विद्युतशक्ति को, केवल समंजन के द्वारा, गरम करने तथा ठंडा करने के लिए काम में ला सकता है। इसी प्रकार बहिरंगा शक्ति, जो जीव को मोहग्रस्त करके जन्म-मृत्यु के चक्र में बारम्बार डालती है, भगवत्कृपा से अन्तरंगा शक्ति में परिणत होकर जीव को शाश्वत जीवन प्रदान करती है। जब जीव पर भगवान् ऐसी कृपा करते हैं, तो वह अपनी उपयुक्त स्वाभाविक स्थिति प्राप्त करके शाश्वत आध्यात्मिक जीवन का आनन्द लेता है।
 
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