श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक
स वा इदं विश्वममोघलील:
सृजत्यवत्यत्ति न सज्जतेऽस्मिन् ।
भूतेषु चान्तर्हित आत्मतन्त्र:
षाड्‍वर्गिकं जिघ्रति षड्‍गुणेश: ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
स:—परमेश्वर; वा—अथवा; इदम्—इस; विश्वम्—प्रकट ब्रह्माण्ड को; अमोघ-लील:—जिनके कर्म निष्कलंक हैं वे; सृजति—उत्पन्न करते हैं; अवति अत्ति—पालन तथा संहार करते हैं; न—नहीं; सज्जते—से प्रभावित होते हैं; अस्मिन्— उनमें; भूतेषु—समस्त जीवों में; च—तथा; अन्तर्हित:—भीतर रहकर; आत्म-तन्त्र:—स्वतन्त्र; षाट्-वर्गिकम्—भगवान् के षड् ऐश्वयों से युक्त; जिघ्रति—सुंगधि की तरह ऊपर-ऊपर आसक्त; षट्-गुण-ईश:—छहों इन्द्रियों के स्वामी ।.
 
अनुवाद
 
 जिनके कर्म सदैव निष्कलुष होते हैं वे भगवान् छह इन्द्रियों के स्वामी हैं और छहों ऐश्वर्यों के साथ सर्वशक्तिमान हैं। वे दृश्य ब्रह्माण्डों की सृष्टि करते हैं, उनका पालन करते हैं और रंचमात्र भी प्रभावित हुए बिना उनका संहार करते हैं। वे समस्त जीवों के भीतर विद्यमान रहते हैं और सदैव स्वतन्त्र होते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् तथा जीवों के बीच का मुख्य अन्तर यह है कि भगवान् सृष्टा हैं और जीव सृष्ट हैं। यहाँ पर उन्हें अमोघ-लील: कहा गया है, जो इस बात का द्योतक है कि उनके सृजन में कुछ भी शोचनीय नहीं है। जो लोग उनकी सृष्टि में गड़बड़ी उत्पन्न करते हैं, वे स्वयं विचलित होते हैं। वे समस्त भौतिक सन्तापों से परे हैं, क्योंकि वे छहों ऐश्वर्यों अर्थात् धन, शक्ति, यश, सौंदर्य, ज्ञान तथा त्याग—से सम्पन्न हैं। इस प्रकार वे इन्द्रियों के स्वामी हैं। उनके द्वारा इन दृश्य जगतों की सृष्टि उन जीवों के उद्धार के लिए की जाती है, जो तीन प्रकार के क्लेशों से ग्रस्त हैं। वे उनका पालन करते हैं और समय आने पर, किसी प्रकार से प्रभावित हुए बिना, उनका संहार कर देते हैं। वे इस भौतिक सृष्टि से बाह्य रूप से उसी तरह सम्बन्धित हैं, जिस प्रकार किसी सुगन्धयुक्त पदार्थ से सम्बन्धित हुए बिना कोई सुगन्धि का सेवन करता है। अतएव ईशताहीन तत्त्व, समस्त प्रयासों के बावजूद, भगवान् के पास तक नहीं पहुँच पाते।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥