श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक
इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।
उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवानृषि: ।
नि:श्रेयसाय लोकस्य धन्यं स्वस्त्ययनं महत् ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
इदम्—इस; भागवतम्—भगवान् तथा उनके शुद्ध भक्तों की कथा वाले ग्रन्थ को; नाम—नामक; पुराणम्—वेदों के अनुपूरक; ब्रह्म-सम्मितम्—भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार; उत्तम-श्लोक—भगवान् का; चरितम्—कार्यकलाप; चकार—संकलित किया; भगवान्—भगवान् के अवतार; ऋषि:—श्री व्यासदेव ने; नि:श्रेयसाय—परम कल्याण के लिए; लोकस्य—सब लोगों के; धन्यम्—पूर्ण रूप से सफल, धन्य; स्वस्ति-अयनम्—सर्व आनन्दमय; महत्—परिपूर्ण ।.
 
अनुवाद
 
 यह श्रीमद्भागवत भगवान् का साहित्यावतार है, जिसे भगवान् के अवतार वेदव्यास ने संकलित किया है। यह सभी लोगों के परम कल्याण के निमित्त है और यह सभी तरह से सफल, आनन्दमय तथा परिपूर्ण है।
 
तात्पर्य
 भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु ने घोषित किया है कि श्रीमद्भागवत समस्त वैदिक ज्ञान तथा इतिहास की निर्मल वाणी है। इसमें भगवान् के संसर्ग में रहने वाले कतिपय महान भक्तों के चुने हुए चरित्र दिये गये हैं। श्रीमद्भागवत भगवान् कृष्ण का साहित्यावतार है, अतएव यह उनसे अभिन्न है। हमें श्रीमद्भागवत की पूजा उसी सम्मान से करनी चाहिए, जिस तरह हम भगवान् की करते हैं। हम इसके सचेष्ट एवं धीर अध्ययन के द्वारा भगवान् का परम आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। जिस प्रकार भगवान् पूर्ण प्रकाश, पूर्ण आनन्द तथा सर्वथा पूर्ण हैं, उसी तरह यह श्रीमद्भागवत भी है। हमें श्रीमद्भागवत का पाठ करने से परब्रह्म श्रीकृष्ण का सारा दिव्य प्रकाश प्राप्त हो सकता है, बशर्ते कि हम इसे पारदर्शी गुरु के माध्यम से ग्रहण करें। पुरी में भगवान् चैतन्य के दर्शनार्थ जितने लोग आते थे उनसे महाप्रभु के निजी सचिव श्रील स्वरूप दामोदर गोस्वामी यही कहा करते थे कि किसी भक्त-भागवत से ही भागवत का अध्ययन करना चाहिए। भक्त-भागवत स्वरूपसिद्ध प्रामाणिक गुरू हैं और वांछित फल प्राप्त करने के लिए उन्हीं से भागवत की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। भागवत के अध्ययन से वे सारे लाभ प्राप्त हो सकते हैं, जो भगवान् की साक्षात् उपस्थिति से होते हैं। यह भगवान् कृष्ण के उन समस्त आशीर्वादों को प्रदान करने वाला है, जो भगवान् के साक्षात् सम्पर्क से मिल सकते हैं।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥