श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक
द्वितीयं तु भवायास्य रसातलगतां महीम् ।
उद्धरिष्यन्नुपादत्त यज्ञेश: सौकरं वपु: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
द्वितीयम्—दूसरा; तु—लेकिन; भवाय—कल्याण के लिए; अस्य—इस पृथ्वी के; रसातल—निम्नतम भागमें; गताम्— गयी हुई; महीम्—पृथ्वी को; उद्धरिष्यन्—उठा कर; उपादत्त—स्थापित किया; यज्ञेश:—स्वामी या परम भोक्ता; सौकरम्—सूकर का; वपु:—अवतार ।.
 
अनुवाद
 
 समस्त यज्ञों के परम भोक्ता ने सूकर का अवतार (द्वितीय अवतार) स्वीकार किया और पृथ्वी के कल्याण हेतु उसे ब्रह्माण्ड के रसातल क्षेत्र से ऊपर उठाया।
 
तात्पर्य
 यहाँ संकेत यह है कि भगवान् के प्रत्येक अवतार के लिए उनके द्वारा सम्पन्न होने वाले विशेष कार्य का भी उल्लेख रहता है। बिना कार्य-विशेष के कोई अवतार नहीं हो सकता और ऐसा कार्य सदा ही अद्वितीय होता है। ऐसे कार्यों का किसी जीव द्वारा सम्पन्न किया जाना असम्भव होता है। शूकर का अवतार पृथ्वी को गन्दे पदार्थ के रसातल भाग से बाहर निकालना था। गन्दे स्थान से कोई चीज उठाना शूकर का कार्य है और सर्व-शक्तिमान भगवान् ने यह आश्चर्य असुरों को कर दिखाया, जिन्होंने पृथ्वी को ऐसे गंदे स्थान में छिपा दिया था। भगवान् के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। यद्यपि उन्होंने शूकर की भूमिका निभाई तो भी वे सदैव दिव्य स्थिति में रहते हुए भक्तों के द्वारा पूजित होते हैं।
 
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