श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
परावरज्ञ: स ऋषि: कालेनाव्यक्तरंहसा ।
युगधर्मव्यतिकरं प्राप्तं भुवि युगे युगे ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
पर-अवर—भूत तथा भविष्य का; ज्ञ:—जानने वाला; स:—वह; ऋषि:—व्यासदेव; कालेन—समय पाकर; अव्यक्त— अप्रकट; रंहसा—महान शक्ति से; युग-धर्म—युग के अनुरूप कार्य; व्यतिकरम्—विसंगतियाँ, दोष; प्राप्तम्—प्राप्त होने पर; भुवि—पृथ्वी पर; युगे युगे—विभिन्न युगों में ।.
 
अनुवाद
 
 महर्षि व्यासदेव ने युग के कर्तव्यों में विरोधाभास देखा। कालक्रम में पृथ्वी पर अदृश्य शक्तियों के कारण विभिन्न युगों में ऐसा होता रहता है।
 
तात्पर्य
 व्यासदेव-जैसे ऋषि मुक्त आत्मा होते हैं, अतएव वे भूत तथा भविष्य को स्पष्ट देख सकते हैं। अतएव वे कलियुग में आने वालो की विसंगतियों को देख सके और तदनुसार उन्होंने जनसामान्य के लिए ऐसा प्रबन्ध किया, जिससे वे इस अन्धकारमय युग में प्रगतिशील जीवन का अनुगमन कर सकें। इस कलियुग के सामान्य लोग नाशवान पदार्थ के प्रति अधिक रुचि दिखाते हैं। अज्ञानता के कारण वे जीवन-निधि का मूल्य नहीं समझ पाते और आध्यात्मिक ज्ञान से आलोकित नहीं हो सकते।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥