श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक
त एत ऋषयो वेदं स्वं स्वं व्यस्यन्ननेकधा ।
शिष्यै: प्रशिष्यैस्तच्छिष्यैर्वेदास्ते शाखिनोऽभवन् ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
ते—वे; एते—ये सब; ऋषय:—विद्वान; वेदम्—विभिन्न वेदों को; स्वम् स्वम्—अपने अपने विषयों के; व्यस्यन्—प्रस्तुत किया; अनेकधा—अनेक; शिष्यै:—शिष्य; प्रशिष्यै:—शिष्यों के शिष्य; तत्-शिष्यै:—उनके भी शिष्यों द्वारा; वेदा: ते—उन वेदों के अनुयायी; शाखिन:—विभिन्न शाखाएँ; अभवन्—इस प्रकार बनीं ।.
 
अनुवाद
 
 इन सब विद्वानों ने अपनी पारी में, उन्हें सौंपे गये वेदों को अपने अनेक शिष्यों, प्रशिष्यों तथा उनके भी शिष्यों को प्रदान किया और इस प्रकार वेदों के अनुयायियों की अपनी- अपनी शाखाएँ बनीं।
 
तात्पर्य
 ज्ञान के मूल स्रोत वेद हैं। संसारी या दिव्य ज्ञान की कोई ऐसी शाखा नहीं है, जो वेदों के मूल भाष्य से सम्बद्ध न हो। उन्हें केवल विभिन्न शाखाओं के रूप में विकसित कर लिया गया है। मूलत: वे महान, सम्माननीय एवं विद्वान आचार्यों द्वारा बनायी गईं। दूसरे शब्दों में, वैदिक ज्ञान विभिन्न शिष्य-परम्पराओं द्वारा, भिन्न-भिन्न शाखाओं में विभाजित होकर, सारे विश्व में वितरित किया गया। अत: वेदों के परे स्वतन्त्र ज्ञान का दावा कोई नहीं कर सकता।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥