श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक
त एव वेदा दुर्मेधैर्धार्यन्ते पुरुषैर्यथा ।
एवं चकार भगवान् व्यास: कृपणवत्सल: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
ते—वे; एव—निश्चय ही; वेदा:—ज्ञान के ग्रंथ; दुर्मेधै:—अल्पज्ञों द्वारा; धार्यन्ते—धारण किये जाते हैं; पुरुषै:—मनुष्य द्वारा; यथा—जिस तरह; एवम्—इस प्रकार; चकार—संकलित किया; भगवान्—शक्तिशाली; व्यास:—व्यास मुनि ने; कृपण-वत्सल:—अज्ञानी जनता के प्रति दयालु ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार, अज्ञानी जनसमूह पर अत्यन्त कृपालु ऋषि व्यासदेव ने वेदों का संकलन किया, जिससे कम ज्ञानी पुरुष भी उनको आत्मसात् कर सकें।
 
तात्पर्य
 वेद एक है। यहाँ पर अनेक शाखाओं में इसके विभाजन के कारणों की व्याख्या की गई है। समस्त ज्ञान का बीज वेद, ऐसा विषय नहीं हैं, जिसे कोई सामान्य व्यक्ति आसानी से समझ सके। ऐसा प्रतिबन्ध है कि जो सुपात्र ब्राह्मण नहीं है, उसे वेद नहीं सीखना चाहिए। इस प्रतिबन्ध की कई प्रकार से गलत व्याख्याएँ की गई हैं। मनुष्यों का एक वर्ग, ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के कारण ही, ब्राह्मण योग्यता का दावा करता है; वह वेदों के अध्ययन को ब्राह्मण जाति का एकाधिपत्य मानता है। लोगों का दूसरा वर्ग इसे उन जाति वालों पर अन्याय बताता है, जो ब्राह्मण कुल में जन्म नहीं ले पाते। लेकिन ये दोनों ही दिग्भ्रमित हैं। वेदों का विषय ऐसा है, जिसकी व्याख्या स्वयं भगवान् ने ब्रह्मा के लिए की थी। अतएव विलक्षण सतोगुणी व्यक्ति ही इस विषय को समझ सकते हैं। रजोगुणी तथा तमोगुणी लोग वेद विषय को नहीं समझ पाते। वैदिक ज्ञान का चरम उद्देश्य भगवान् श्रीकृष्ण हैं। जो लोग रजो तथा तमोगुणी हैं, वे भगवान् को बहुत कम समझ पाते हैं। सत्ययुग में प्रत्येक व्यक्ति सतोगुणी होता था। धीरे-धीरे त्रेता तथा द्वापर युगों में सतोगुण का ह्रास होता गया और जनता भ्रष्ट होती गई। आधुनिक युग में सतोगुण प्राय: शून्य है, अतएव जनता के हित के लिए परम दयालु सम्पन्न ऋषि श्रील व्यासदेव ने वेदों को अनेक प्रकार से विभक्त कर दिया, जिससे वे रजोगुण तथा तमोगुण वाले अल्पज्ञों द्वारा भी समझे जा सकें। इसकी व्याख्या अगले श्लोक में की गई है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥